मुआवजा कम करवाने के लिए अपील करना चंडीगढ़ प्रशासन को महंगा पड़ गया। हाईकोर्ट ने झटका देते हुए तीन गुना ज्यादा भुगतान करने के निर्देश दिए। सारंगपुर की 214 कनाल 7 मरला जमीन के अधिग्रहण की 2005 की नोटिफिकेशन और निर्धारित मुआवजे की राशि को लेकर दाखिल अपील का पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने निपटारा कर दिया।
जहां चंडीगढ़ प्रशासन को अपील मंहगी पड़ गई और हाईकोर्ट ने मुआवजा राशि को कलेक्टर द्वारा निर्धारित राशि के तीन गुना के बराबर कर दिया। यूटी प्रशासन ने 2005 में सारंगपुर की 214 कनाल 7 मरला भूमि को अधिग्रहीत करने का फैसला लिया था। इस फैसले के बाद भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने भूमि की कीमत 25,76,121 रुपये प्रति एकड़ आंकी थी।
प्रशासन द्वारा लगाई गई कीमत पर असंतोष जताते हुए भूमि मालिकों ने फैसले को निचली अदालत में चुनौती दी थी। निचली अदालत ने कीमत को असेस करने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए उसे 49,46,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से भुगतान करने के आदेश दिए थे। इन आदेशों के बाद भूमि मालिकों ने मुआवजा कम होने की हाईकोर्ट में दलील दी।
हाईकोर्ट ने भूमि मालिकों के हक में फैसला सुनाया
highcourt
दूसरी ओर निचली अदालत द्वारा तय किए गए मुआवजे को अधिक बताते हुए प्रशासन ने इसे कम करने के लिए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। दोनों पक्षों की ओर से करीब 79 याचिकाएं सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के समक्ष पहुंची थीं। इन सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने अपना फैसला भूमि मालिकों के हक में सुनाया।
हाईकोर्ट में प्रशासन की दलील थी कि 2003 में कुछ भूमि की 14,06,451 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से बिक्री हुई थी और ऐसे में प्रशासन द्वारा निर्धारित 25,76,121 रुपए प्रति एकड़ मुआवजा सही है। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट द्वारा 2003 में आंकी गई सारंग पुर की जमीन की कीमत 27,90, 000 रुपये प्रति एकड़ ली और वहीं धनास की भूमि का 2006 में निर्धारित 91,80,000 रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा देखा।
इसके बाद कोर्ट ने पाया कि दोनों आदेशों में 26 माह का फर्क है और इन 26 माह में प्रापर्टी के दाम प्रति माह 2 लाख 45 हजार 769 रुपए प्रति एकड़ बढ़े हैं। इस आधार पर हाईकोर्ट ने 2006 में निर्धारित 91,80, 000 में 20 प्रतिशत की कटौती करके मुआवजा राशि प्रति एकड़ 73,44,000 रुपए प्रति एकड़ निर्धारित कर दी।