मोटर एक्सीडेंट क्लेम को लेकर दाखिल एक याचिका का निपटारा करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि मांगे गए वाहन से कोई दुर्घटना होती है तो बीमा कंपनी उसके क्लेम के भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं है।
नारनौल के हरिंदर सिंह से बाइक मांगकर वहीं का योगेंद्र अपने साथी नरेश के साथ जा रहा था। इसी बीच रास्ते में नीलगाय के आने के एक्सीडेंट हो गया। हादसे में योगेंद्र की मौत हो गई। उसके परिजनों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल करते हुए मुआवजे की मांग की। इस पर ट्रिब्यूनल ने क्लेम को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ परिजनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन का पर्सनल एक्सीडेंट कवर बीमा था। इस स्थिति में कंपनी केवल मालिक के साथ कोई दुर्घटना होने की स्थिति में मुआवजा देने को बाध्य है। भले ही कोई व्यक्ति किसी का वाहन लेकर जाता है और उसके पास वैध लाइसेंस होता है तो भी वह ऑनर ड्राइवर की परिभाषा में नहीं आता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऑनर ड्राइवर की परिभाषा मोटर व्हीकल एक्ट में स्पष्ट की गई है। ऐेसे में इसमें न तो कोई शब्द जोड़ा जा सकता है और न ही इसमें से हटाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रिब्यूनल ने क्लेम को सही खारिज किया है। उसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी का वाहन लेकर जाता है तो वह उसका मालिक नहीं हो जाता।
केवल वैध लाइसेंस होना मालिकाना हक की पुष्टि नहीं करता है। जिस वाहन पर वह सवार थे उसका किसी अन्य वाहन से एक्सीडेंट नहीं हुआ और ऐसे में नो फाल्ट का मामला बनता है। इसलिए बीमा कंपनी मुआवजे की राशि देने केलिए बाध्य नहीं है। हालांकि नो फाल्ट की स्थिति में हरियाणा सरकार ने 50 हजार रुपये मुआवजा राशि तय की है।
यह राशि पाने के लिए पीड़ित के परिजन हकदार हैं। हाईकोर्ट ने मृतक के परिजनों को 50 हजार रुपये मुआवजा मंजूर करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।