पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि नाबालिग से यौन अपराध के मामले को साबित करने के लिए शुक्राणुओं की मौजूदगी अनिवार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने लुधियाना निवासी व्यक्ति की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया है।
लुधियाना निवासी व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए जाने और 20 साल के कारावास की सजा के आदेश को चुनौती दी थी। याची ने तर्क दिया था कि नाबालिग पीड़िता और उसके बीच संबंध सहमति से बने थे। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की दलील के आधार पर अभियुक्त की ओर से उठाया गया कोई भी बचाव कदम पूरी तरह से महत्वहीन है। हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने बयान दिया था कि अभियुक्त ने उसे विवाह का वादा किया और इसी बहाने कई अवसरों पर उसके साथ दुष्कर्म किया।
डीएनए रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए कोर्ट ने उल्लेख किया कि मेडिकल जांच के समय पीड़िता के निजी अंग में शुक्राणु मौजूद नहीं थे। ऐसे में डीएनए मिलान नहीं हो पाया। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया कि शुक्राणु की अनुपस्थिति का मतलब यह होगा कि पीड़िता द्वारा दी गई गवाही झूठी है। हाईकोर्ट ने मामले में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम के तहत नाबालिग से दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के लिए दोषसिद्धि बरकरार रखी। हाईकोर्ट ने कहा कि जब नाबालिग पीड़िता पर यौन उत्पीड़न किया जाता है तो उसके गुप्तांग में शुक्राणुओं का निकास अनिवार्य नहीं है।