मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भ्रूण को दिल की एक ऐसी बीमारी है, जिसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार 20 सप्ताह के गर्भ को गिराने की ही अनुमति दी जा सकती है और याची का भ्रूण 21 सप्ताह का हो चुका है।
पीजीआई की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों को देखते हुए मामले में गर्भपात की अनुमति देना जरूरी है। जब भ्रूण ऐसी बीमारी से ग्रस्त है, जो ठीक नहीं हो सकती तो ऐसे में इस तरह का आदेश जायज है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तपस्या उमेश बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उस मामले में भी 24 सप्ताह के गर्भ को गिराने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पीजीआई चंडीगढ़ के प्रसूति और स्त्री रोग विभाग को आदेश दिया है कि वो विलंब न करते हुए शीघ्र ही याची का गर्भपात कराएं।