प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल
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पंजाब में पूरी तरह से राजनीति की तस्वीर बदलने और विधानसभा चुनाव में शिअद-भाजपा गठबंधन की करारी शिकस्त के पीछे पांच बड़े कारण रहे। किसानों का कर्ज, नौजवानों का नशे के दलदल में फंसना, उद्योग का पलायन, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचना और भ्रष्टाचार। बदले की राजनीति में दस सालों तक राज करने वाले बदलाव की आंधी में खुद को संभाल नहीं सके।
पंजाब में कांग्रेस का सत्ता में लौटना वर्ष 1967 और 1977 का वो इतिहास दोहरा रहा है जब पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी थी और विपक्ष में बैठने लायक सत्ता छोड़ने वाली सरकार को नहीं छोड़ा था। वर्ष 2017 के चुनाव में 77 सीटों पर कांग्रेस जीत का परचम लहरा कर पंजाब को खुशहाल पंजाब बनाने के लिए सत्ता में यदि पहुंची तो उसके पीछे कमजोरियां बादल सरकार की ही रही हैं। माझा में कांग्रेस की तस्वीर बाकी स्थानों से काफी मजबूत है।
हालांकि आम आदमी पार्टी ने जो तस्वीर सोशल मीडिया के माध्यम से दिखाई वो उनके काम नही आई, क्योंकि पंजाब का वोटर बहकावे में नही आता, अपना रोष, गुस्सा वह दिखाता है भले ही चेहरे पर भाव कुछ भी हों। पंजाब का किसान आत्महत्याएं करता रहा पर राजनीति के सिवा कुछ नही मिला। नशा बढ़ता रहा और सरकारें दावों को झुठलाती रहीं। उद्योग पंजाब से पलायन करता रहा और सरकार एनआरआई से व्यापार बढ़ाने की मीटिंगों में जुटा रहा।
विकास कार्य तो हुए पर विकास के नाम पर भ्रष्टाचार जमकर हुआ। इन्हीं कारणों से पंजाब में जो बदलाव की आंधी चली उसमें गठबंधन तीसरे नंबर पर पहुंचा और आप दूसरे नंबर पर। माझा में कांग्रेस के सामने कोई-कोई ही टिक सका लेकिन मालवा व दोआबा में कांग्रेस को टक्कर मिली। आम आदमी पार्टी पार्टी का भले ही तिलिस्म नहीं चला लेकिन दूसरी बड़ी पार्टी बनकर पंजाब की राजनीति में कदम रख दिया है।
कांग्रेस अगर सत्ता काल में वही गलतियां दोहराती जो पिछले दस सालों से दोहराई जाती थी तो पंजाब के पास सिर्फ विकल्प आप रह जाएगी। पंजाब की जनता ने बहुमत देकर कांग्रेस को पंजाब में नई पारी खेलने के लिए जो पिच दी है उनमें कैप्टन (अमरिंदर सिंह) हैं, सिद्धू हैं और कई ऐसे बड़े नेता जो कांग्रेस की टिकट पर जीतने के बाद भी विपक्ष में बैठते रहे हैं। इस बार कांग्रेस के पास मौका है। वहीं शिअद-भाजपा के पास अब पांच साल का इंतजार बचा है।