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पंजाब चुनाव: जानिए किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा विकल्प

Mon, 06 Feb 2017 12:45 PM IST
हर्ष कुमार सलारिया/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब विस चुनाव
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पंजाब की 15वीं विधानसभा के लिए शनिवार को वोटरों ने 1145 प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद कर दिया। अब 11 मार्च को चुनाव नतीजों की घोषणा तक पंजाबवासियों का हर दिन इस चर्चा के साथ गुजरेगा कि सूबे में अगली सरकार किसकी बनेगी? चर्चा का विषय यह भी रहेगा कि पहली बार त्रिकोणीय चुनाव मुकाबले के बीच अगर किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो सूबे में सरकार बनाने के लिए कौन-कौन से दलों के बीच गठजोड़ होना संभव है?
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शनिवार को शाम 5 बजे तक 70 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। हालांकि इस समय तक मतदान केंद्रों में पहुंच चुके वोटरों ने रात करीब 9 बजे तक वोट डाले और कुल मतदान 75 फीसदी दर्ज हुआ, जोकि वर्ष 2012 के 76.6 फीसदी मतदान से कम है। इस बीच, पूरा दिन विभिन्न ?हलकों से प्राप्त हुए वोटरों के रुझान से यही निष्कर्ष निकला कि अधिकांश विधानसभा सीटों पर मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच रहा।

शिअद-भाजपा गठबंधन के इस दौड़ में तीसरे स्थान पर पिछड़ने की आशंका जताई गई है। प्रदेश का मालवा क्षेत्र जहां सबसे अधिक 69 विधानसभा हलके हैं और इसी क्षेत्र में सर्वाधिक सीटें जीतने वाली पार्टी की ही हमेशा सरकार भी बनती रही है, में कांग्रेस और आप के बीच बराबर की टक्कर दिखाई दी। 
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ग्राउंड रिपोर्ट में नहीं दिखा डेरे का असर

पंजाब विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला
माना जा रहा था कि डेरा सच्चा सौदा द्वारा इन चुनावों में शिअद-भाजपा गठबंधन को समर्थन दिए जाने से मालवा क्षेत्र में 35 लाख से अधिक डेरा प्रेमियों के वोट गठबंधन की झोली में चले जाएंगे, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट में ऐसा प्रभाव भी दिखाई नहीं दिया, उलटे शिअद को इस समर्थन के चलते अपने पारंपरिक पंथक वोटरों की नाराजगी झेलनी पड़ी है, जो मतदाताओं से बातचीत में उभर कर सामने आई।

ग्राउंड रिपोर्ट में ही यह बात भी सामने आई कि गुर्जर और दलित वोटरों का ज्यादा झुकाव आप की तरफ देखा गया। शिअद के नाराज पंथक वोटर भी कांग्रेस और आप की ओर जाते दिखाई दिए हैं। इस तरह, माना जा रहा है कि 19-20 के अंतर से जीत का सेहरा कांग्रेस या आप के सिर बंध सकता है, लेकिन यह केवल अनुमान है क्योंकि अगर डेरा प्रेमियों के सभी वोट गठबंधन की झोली में गए तो चुनाव के नतीजे बिल्कुल अलग होंगे और तीनों ही दाबेदारों में कोई भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकेगा।

एक नजर वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव नतीजों पर डालें तो, प्रदेश में शिअद-भाजपा गठबंधन ने अप्रत्याशित जीत हासिल कर सत्ता में कब्जा जमाए रखा था। यह जीत इतनी अप्रत्याशित थी कि उस समय के सभी सर्वे रिपोर्ट में कांग्रेस को अगली सरकार बनाते हुए दिखाया गया था। और तो और, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी नतीजों का अनुमान लगाकर, नतीजे आने से पहले ही परिवार सहित विदेश घूमने निकल गए थे। उस चुनाव में कांग्रेस को करीब 40 फीसदी वोट मिले जबकि गठबंधन को करीब 37 फीसदी। लेकिन 21 सीटों पर कांग्रेस को अपने बागियों के कारण ही हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस की स्थिति कमोबेश 2017 के चुनाव में भी वैसी ही है। इस बार भी बागी कांग्रेस के लिए सिरदर्द हैं। उधर, शिअद को भी कुछ सीटों पर बागियों का सामना करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर शिअद को इस बार डेरे के वोटों का ही आसरा अधिक है।
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दिल्ली के खट्टे अनुभवों के बाद कांग्रेस के साथ नहीं जाना चाहेगी आप

विधानसभा चुनाव - फोटो : File Photo
इन सारी परिस्थितियों के मद्देनजर यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिला तो, क्या आप और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाएंगे? क्या भाजपा से अलग होकर शिअद और कांग्रेस न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत एकजुट होंगे? या फिर सरकार बनाने के लिए शिअद और आप में कोई गठबंधन हो सकता है? दिल्ली में सरकार बनाने के बाद आप पहली बार किसी? अन्य राज्य में भाग्य आजमा रही है।

दिल्ली में एक समय कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की कोशिश का आप को जनता से जो विरोध झेलना पड़ा था, उसकी पुनरावृत्ति वह पंजाब में किसी भी कीमत पर नहीं करना चाहेगी। पार्टी ने जिन सिद्धांतों को लेकर आम लोगों के बीच पहचान बनाई है, किसी भी सियासी दल के साथ जुड़ते ही, आप का वजूद ही संकट में घिर जाएगा। जहां, शिअद-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस का प्रश्न है।

शिअद और भाजपा के बीच 94-23 सीटों का गठजोड़ है। नोटबंदी ने पंजाब में भाजपा को मुश्किल में डाला है। ऐसे में शिअद अगर डेरा प्रेमियों के दम पर अपनी 94 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती है और अगर दूसरी तरफ कांग्रेस भी मजबूत हो जाती है तो कैप्टन अमरिंदर और बादल के पारिवारिक रिश्ते एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम की ओर बढ़ सकते हैं। हालांकि, आपरेशन ब्ल्यू स्टार और 84 के दंगे शिअद को ऐसा कदम उठाने से अवश्य रोकेंगे।

 
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