सुखना लेक पर टॉयलेट बनाने के आदेश के बावजूद अभी तक कार्य चल रहा है यह दलील देना एमसी चंडीगढ़ को भारी पड़ गया। हाईकोर्ट ने एमसी को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर टॉयलेट बनवाने जैसे आदेश कोर्ट को देने पड़ रहे हैं तो एमसी की कार्यशैली कैसी है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि हम कार्यशैली पर टिप्पणी नहीं करना चाहते पर शेम ऑन यू।
मामले की सुनवाई आरंभ होते ही हाईकोर्ट ने सुखना को लेकर प्रशासन से उनका पक्ष पूछा। प्रशासन की ओर से बताया गया कि एक बैठक का आयोजन किया गया था। इस बैठक में पानी रहते सिल्ट निकालने पर विचार किया गया और विशेषज्ञों ने ऐसा न करने की राय दी। यदि ऐसा किया गया तो लेक में सीपेज आ जाएगी और पानी नहीं रुकेगा। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सोच का दायरा बढ़ाया जाए।
बॉम्बे में पुल के निर्माण का उदाहरण देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वहां पुल बनाने के लिए समुद्र के पानी को कंट्रोल किया गया था। यहां पर तो छोटी सी लेक है, जहां पानी को व्यवस्थित करना है। मुंबई की तर्ज पर यहां पर भी लेक को हिस्सों को बांटकर पानी को एक जगह स्टोर कर बाकी जगह खाली कर वहां डिसिल्टिंग की जाए और फिर स्टोर किया गया पानी छोड़ दिया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि आज का श्रमदान ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुखना को बचाए रखेगा। यदि आज प्रयास नहीं किया गया तो आगे आने वाली पीढ़ियां केवल सुखना का नाम ही सुन पाएंगी।
केंद्र सरकार की राय यूटी से अलग
केंद्र सरकार की ओर से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल चेतन मित्तल ने पेश होकर बताया कि वेट डि सिल्टिंग संभव है और इसके बारे में एक्सपर्ट के व्यू पहले ही सौंपे जा चुके हैं। यूटी प्रशासन वैट डिसिल्टिंग से पहले ही इनकार कर चुका है। ऐसे में इस पर दोनों की राय अलग है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई के दौरान इन सभी पक्षों को लेकर बहस होगी और वैट डिसिल्टिंग पर प्रशासन अपना पक्ष रखे।