अपनी मर्जी से शादी रचाकर परिजनों से खतरा बताते हुए सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट की शरण में आने वाले जोड़ों के लिए हाईकोर्ट का आदेश अब शादी के प्रमाण का हथियार नहीं बन सकेगा। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस परमजीत सिंह की बेंच ने नई परंपरा शुरू कर दी है।
सुरक्षा की गुहार लेकर हाईकोर्ट आए कुछ जोड़ों के मामले में बेंच ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि ऐसा आदेश केवल सुरक्षा के संबंध में मान्य होगा। शादी की कानूनी मान्यता के लिए अलग प्रक्रिया का प्रमाण देना पड़ेगा। अमेरिका से आई एनआरआई अमनप्रीत कौर व उसके प्रेमी ने हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
पहले यह मामला सुनवाई के लिए जस्टिस परमजीत सिंह की बेंच के पास आया था। अमनप्रीत ने याचिका में कहा था कि उसने परिजनों की मर्जी के बगैर शादी रखाई है। अब परिजनों से उनसे खतरा है। बेंच ने जब पूछा कि उसके परिजन कहा रहते हैं, तो जवाब मिला कि वे अमेरिका में रहते हैं।
इस पर बेंच ने कहा कि जब परिजन भारत में ही नहीं हैं, तो उनसे खतरा कैसे? इस पर अमनप्रीत को न केवल माफी मांगनी पड़ी, बल्कि उसके वकील ने याचिका वापस लेनी उचित समझी।
बेंच ने हालांकि याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी, लेकिन सुरक्षा की मांग को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे चार अन्य जोड़ों के मामलों में हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया कि यह आदेश केवल सुरक्षा के संबंध में है।
शादी के प्रमाण के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया का हवाला देना होगा। हाईकोर्ट का आदेश शादी का प्रमाण नहीं माना जाएगा। उल्लेखनीय है कि इससे पहले सुरक्षा के मामलों में यह विशेष तथ्य शामिल नहीं होता था।