उनका आरोप है कि एक बार पुलिस उन्हें डीजीपी के कार्यालय ले गई और वहां लूथरा की मौजूदगी में विवाद निपटारे के लिए 50 लाख मांगे। याची नहीं माना तो अस्थाना का नाम छिपाने के लिए फर्जी दस्तावेज के आधार पर 19 मार्च 2018 को धोखाधड़ी का झूठा केस उस पर दर्ज किया गया। जब पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी को शिकायत दी तो आदेश का पालन कर पुलिस द्वारा दस्तावेज नहीं पेश करने पर चेयरमैन एमएस चौहान ने इस्तीफा दे मामला प्रशासक को भेज दिया गया।
याची ने अस्थाना, लूथरा और अन्य के खिलाफ जो शिकायत दी थी उस पर उनका बचाव करने के लिए नियमों को ताक पर रख स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर नियुक्त किया गया।
पीएमओ को भी दी शिकायत
याची का कहना है कि जब सब प्रयास विफल रहे तो उसने पीएमओ, सीवीसी और सीबीआई को शिकायत दी। 10 दिसंबर 2019 को सीबीआई ने विजिलेंस को जांच दी और पीएमओ ने 13 अगस्त 2020 को प्रशासक को शिकायत पर कार्रवाई के आदेश दिए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने इन बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए याची पर दबाव बनाना आरंभ किया और 25 सितंबर 2018 की एक शिकायत को आधार बना 21 सितंबर 2020 को तथ्यों का नजर अंदाज कर एफआईआर दर्ज करवा दी।
याची ने इस मामले की जांच चंडीगढ़ पुलिस के अतिरिक्त किसी अन्य एजेंसी या पंजाब पुलिस से करवाने की मांग की थी। याची ने कहा था कि मामले में हाई प्रोफाइल लोगों के नाम हैं, इसलिए जांच प्रभावित न हो इसके लिए हाईकोर्ट के वर्तमान जज की गिनरानी में जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही चंडीगढ़ में उस पर केस दर्ज होने की स्थिति में गिरफ्तारी से पहले सात दिन का नोटिस दिया जाए।
सोशल मीडिया पर दोस्त होना लाभ देना साबित नहीं करता
इस मामले में याची ने बताया था कि राकेश अस्थाना के साथ शिकायतकर्ता सोशल मीडिया पर जुड़ी थी और उनके करीबी संबंध थे। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारी से सोशल मीडिया पर जुड़ने का मतलब यह नहीं है कि अधिकारी अवैध कार्य या आपराधिक मामले में अपने पद का गलत इस्तेमाल कर उसे फायदा देगा।