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जब तक 40 जवानों की मौत का बदला नहीं ले लेते, तब तक मांग में सिंदूर नहीं सजाऊंगी: पूनम

Mon, 18 Feb 2019 12:02 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जींद(हरियाणा)
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सीआरपीएफ जवान की पत्नी
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जब तक सरकार और सेना पुलवामा में शहीद 40 जवानों का बदला नहीं ले लेती, तब तक मैं अपनी मांग में सिंदूर नहीं सजाऊंगी, ये एलान एक जवान की पत्नी ने किया है। जवानों की शहादत से जहां पूरा देश दुखी है, वहीं देश की सुरक्षा में तैनाता जवानों, सैनिकों के परिजन इस घटना से बेहद दुखी हैं। आतंकवादी हमले के बाद से सैनिकों के परिवारों का बदला लेने के लिए खून खोल रहा है। शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए रविवार को शहीद स्मारक पर आयोजित कार्यक्रम में सैनिकों के परिवारों का यह दुख उभर कर सामने आया।
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कार्यक्रम में सैनिकों के परिवार और अन्य सामाजिक संस्थाओं के लोगों ने भाग लिया। इसमें भटनागर कॉलोनी निवासी डीएवी स्कूल की अध्यापिका पूनम ने भी भाग लिया। पूनम के पति प्रदीप सीआरपीएफ में हैं और इस समय उनकी तैनाती जम्मू में है। इस मौके पर पूनम ने देश में पल रहे गद्दारों के सफाए की मांग की। पूनम ने कहा कि आज सैनिकों पर जो हमले हो रहे हैं, उनमें सबसे ज्यादा दोष देश में पल रहे गद्दारों का है। देश में जो आतंकी बैठे हैं, सरकार को पहले उनका सफाया करना चाहिए।

उसने कहा कि आतंकवादियों में इतनी हिम्मत नहीं की वे सैनिकों पर हमला कर सकें। यह हमले देश में बैठे गद्दार करवा रहे हैं। पूनम ने इस घटना से दुखी होकर कहा कि जब तक शहीदों की मौत का बदला नहीं लिया जाता, तब तक सिंदूर नहीं पहनने की कसम लेती हूं। इस दौरान अपना पत्नी धर्म निभाते हुए सैनिक पति पर कविता भी लिखी। पूनम ने कविता के माध्यम से कहा कि ‘मैं एक फौजी की पत्नी हूं, सोचती हूं किनारा कर लूं, देश को देश देख ले, अपने जीने का सहारा कर लूं, न कभी डरी हूं न कभी डरूंगी, जब तक शहीदों की मौतों का बदला नहीं ले लेते अपनी मांग में सिंदूर नहीं सजाऊंगी’।
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जवानों के लिए लिखी यह कविता

फौजी की पत्नी हूं, सोचती हूं किनारा कर लूं।
देश को देश देख ले, मैं अपनी जीने का सहारा कर लूं।
ना ना ना ना इतना बड़ा बलिदान ना दे पाऊंगी।
दो वक्त की रोटी के बदले पति की जान ना दे पाऊंगी।
फौजी की पत्नी हूं, नहीं यह गर्व मनाना है।
 मुझे तो पिया संग दीपावली का पर्व मनाना है।
 कंपकंपाते हाथों से मांग नहीं सजाना चाहती हूं।
मैं तो पति संग बीमार बच्ची को डॉक्टर के पास ले जाना चाहती हूं।
बूढ़े मां-बाप को अकेले कमरे में रोते नहीं देखना है।
मुझे तो अपनी बच्चियों के पास उनके पापा को सोते देखना है।
न कवयित्री हूं, न लेखिका न साहित्यकार हूं।
फौजी की पत्नी हूं भाव विह्वल हूं, आक्रोशित हूं, लाचार हूं।
शब्द नहीं मिल रहे थे अंतर्मन को व्यक्त करने के लिए।   
किंतु शायद इतने ही काफी हैं रगों में बहते पानी को रक्त करने के लिए।
बच्चों के चेहरे देखती हूं तो सिहर जाती हूं।
पापा कब आएंगे के जवाब में केवल गर्दन हिलाती हूं।
माना अंदर से मजबूत हूं, पर इतना बड़ा जिगर नहीं पति को टुकड़ों में समेट लूं।
इतनी निडर नहीं, दहशत के साये में और नहीं जी पाऊंगी।
हमारे हैं, वह बस हमारे सरहद से छीन लाऊंगी।
पर इससे पहले एक कसम खाऊंगी।
जब तक वह इन 47 मौतों का बदला नहीं ले लेते।
अपनी मांग में सिंदूर नहीं सजाऊंगी, सिंदूर नहीं सजाऊंगी।
फौजी की पत्नी हूं चाह कर भी किनारा न कर पाऊंगी।
इतनी लाशों का बोझ उठाकर पति संग दिवाली कैसे मना पाऊंगी।
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