प्राइवेट हो या सरकारी हॉस्पिटल्स, मरीज का सबसे ज्यादा रुपया दवाओं पर खर्च होता है। महंगे इलाज की मूल जड़ महंगी दवाएं हैं। जिन कंपनियों पर सरकार का कंट्रोल नहीं है, वे मनमाने ढंग से दवाओं के रेट तय करते हैं। इसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
पिछले साल अमर उजाला ने शहर के अलग-अलग हिस्सों की केमिस्ट शॉप्स पर पड़ताल की थी, जिसमें पता चला था कि एक ही दवा के अलग-अलग रेट हैं और सभी में जमीन-आसमान का अंतर था। सरकार समय-समय पर ड्रग्स प्राइज कंट्रोल आर्डर के तहत दवाओं के रेट फिक्स करती है, लेकिन अब भी कई ऐसी जीवन रक्षक दवाएं हैं, जिन पर कोई कंट्रोल नहीं है।
प्राइवेट हॉस्पिटल्स ऐसे उठाते हैं फायदा :
जिन मरीजों का इलाज प्राइवेट हॉस्पिटल्स में चलता है तो उन्हें बाहर से दवाएं खरीदने नहीं दी जाती है। हॉस्पिटल्स खुद अपनी फार्मेसी से दवा देते हैं। उसमें मरीज दखल नहीं दे सकते। फार्मेसी अपनी मनपसंद कंपनी की एमआरपी रेट पर दवा देती है। यदि वही मरीज बाहर किसी केमिस्ट शॉप से खरीदें तो उसे 15 से 20 प्रतिशत डिस्काउंट मिलता है, क्योंकि बाहर केमिस्ट शॉप्स के बीच कंपटीशन है।
इससे समझे रेटों में कितना अंतर :
मेरोपैनम भारी इंफेक्शन के दौरान प्रयोग में आने वाला एंटीबायोटिक्स का इंजेक्शन है। एस्ट्रा कंपनी इसे 2700 रुपये में बेचती है जबकि आर्चिड कंपनी इसे मात्र 899 रुपये में बेचती है। यही इंजेक्शन सिपला कंपनी मेरोकिट ब्रांड नाम से 2300 रुपये में बेच रही है। एंटी कैंसर दवा बोरटेजोमिब को बोरटेट्रस्ट नामक कंपनी बाजार में 10 हजार रुपये में बेच रही है, जबकि वही दवा एक मरीज भारत सीरम के ब्रांड नाम से मात्र 1650 रुपये में लेकर आया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दवाओं में कितना खेल चल रहा है।
एमआरपी पर खेल, उसे नीचे लाना होगा :
दवाओं पर सारा खेल एमआरपी (मैक्सिमम रिटेल प्राइज) का है। ऐसा नहीं है कि सरकार इसे कंट्रोल नहीं कर सकती। सरकार चाहे तो कई जरूरी दवाओं को ड्रग्स प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) के तहत ला सकती है। ऐसा करने से दवाओं के रेट तय हो जाते हैं। उसके बाद कोई भी कंपनी उस रेट से ज्यादा दवाएं नहीं बेच सकती। हालांकि समय-समय पर डीपीसीओ के तहत साल्ट के दाम तय होते रहते हैं, लेकिन उसे फिर से रिवाइज करने की जरूरत है।
साइड इफेक्ट भी :
एल्बुयूमिन एक जीवन रक्षक दवा है। खास तौर पर यह दवा किडनी और ब्लड एक्सचेंज के दौरान काम आती है। सरकार ने डीपीसीओ के तहत इसके रेट कंट्रोल कर दिए। इससे दवा बनाने वाली कंपनी को मुनाफा कम हो गया। इसका नुकसान यह हुआ कि कंपनी ने इसका आयात कम कर दिया। अब स्थिति यह है कि शहर में यह दवा नाम मात्र की मिल रही है। जो दे रहे हैं, वे महंगी दे रहे हैं। मरीजों को काफी परेशानी आ रही है।
मैंने रसायन और उर्वरक मंत्री को एक लेटर और ई-मेल भेजकर उनसे आग्रह किया है कि डीपीसीओ की फिर से समीक्षा की जाए, ताकि मरीजों को फायदा मिल सके।
प्रिंस भुंढेला, अध्यक्ष, बीजेपी फार्मा सेल