वर्चस्व की जंग लड़ रहे प्रदेश कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा के अपने भी वक्त आने पर बेगाने हो गए। सूबे के अधिकतर विधायक पहले ही कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ थे।
लेकिन प्रदेश प्रधान बनने के बाद बाजवा ने जिन लोगों को जिला प्रधानगी देकर नवाजा था, मुश्किल वक्त में वे भी साथ छोड़ गए। बाजवा समर्थक कई विधायकों ने भी पाला बदल लिया।
मुश्किल वक्त में अपने साथ छोड़ गए बाजवा का
विधानसभा चुनाव-2012 में कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रदेश प्रधान थे। टिकट वितरण भी उनके मुताबिक ही हुआ था। लिहाजा जीतने वाले विधायकों में ज्यादा संख्या में लोग उनके खेमे के थे। 2013 में प्रताप बाजवा को प्रदेश प्रधान बनाया गया।
उसके बाद बाजवा ने अपनी कार्यकारिणी गठित की। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बाजवा को फ्रीहैंड दिया। बाजवा ने अपनी मर्जी से प्रदेश कार्यकारिणी गठित की। अपने ही मुताबिक जिला प्रधान बनाए।
बाद में इसका काफी विरोध भी हुआ था। लेकिन सारा विरोध झेल कर जिन लोगों को बाजवा ने अपनी टीम में शामिल किया था, वे ही मुश्किल वक्त में उनका साथ छोड़ गए।
कैप्टन-बाजवा में चल रहा शक्ति प्रदर्शन
इस समय प्रदेश कांग्रेस में उपचुनाव के नाम पर कैप्टन और बाजवा के बीच भी शक्ति प्रदर्शन चल रहा है। ऐसे नाजुक वक्त पर बाजवा के लोग साथ छोड़ कर कैप्टन गुट में चले गए।
इनमें जालंधर के दोनों प्रधान राजिंदर बेरी व जगबीर बराड़, अमृतसर देहाती प्रधान गुरजीत औजला, लुधियाना के दोनों प्रधान पवन दीवान व मलकीत दाखा, होशियारपुर के सुंदर शाम अरोड़ा, कपूरथला के नवतेज चीमा शामिल हैं।
ये सभी लोग पटियाला चुनावी मीटिंग में शामिल हुए। बाजवा के साथ चलने वाले कुलजीत नागरा, चरनजीत चन्नी, भारत भूषण आशू, बलबीर सिद्धू जैसे विधायक भी पटियाला पहुंचे।
सतनाम कैंथ व साधू सिंह धरमसोत को बाजवा ने प्रदेश महासचिव बनाया, वे भी तलवंडी साबो के बजाय पटियाला चुनाव में डट गए। मोहिंदर सिंह केपी का ग्रुप भी पटियाला पहुंचा।
करीबियों को किया था दरकिनार
प्रताप बाजवा ने पद बांटते समय अपने करीबियों को दरकिनार कर दूसरे गुटों केलोगों को अपना बनाने की कोशिश की। जगबीर बराड़ को कैप्टन पार्टी में लाए थे, बाजवा ने प्रधान बनाया, अब वह फिर कैप्टन के साथ हो लिए। इसी तरह मनीष तिवारी गुट के पवन दीवान पद दिया। पर इन्होंने मौके पर बाजवा का साथ नहीं दिया।