हरियाणा में लोकसभा चुनावों में ओपीएस (ओल्ड पेंशन स्कीम) के मुद्दे पर राजनीति गरमाएगी। सत्ताधारी पार्टी भाजपा इसे लागू करने को लेकर साफ इंकार कर चुकी है और न्यू पेंशन स्कीम में संशोधन के लिए कमेटी का गठन किया हुआ है।
वहीं, प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सत्ता में आते ही इसकी बहाली की घोषणा कर वापसी की कोशिश में है। क्योंकि यह मुद्दा केंद्र और राज्य दोनों से जुड़ा है, इसलिए लोकसभा चुनाव में कर्मचारी संगठनों के साथ-साथ राजनीतिक दल भी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेंगे। देखना यह है कि प्रदेश का कर्मचारी वोट बैंक किसके खाते में डलेगा।
कर्मचारी दिल्ली और पंचकूला में दो बड़ी रैलियां करके सरकार को चेता चुके हैं। देखना यह है कि लोकसभा चुनावों में विपक्षी दल किस प्रकार से इस मुद्दे को भुनाते हैं और सत्तारूढ़ दल किस प्रकार से कर्मचारी वोट बैंक को साधेगा।
इसलिए है मुद्दा
किसी भी प्रदेश के लिए सरकार बनाने और बिगाड़ने में कर्मचारियों को अहम रोल होता है। पढ़ा लिखा वर्ग होने के चलते वह रोजाना हजारों लोगों के साथ सीधे संपर्क में होते हैं। आम जनता में भी वह किसी मुद्दे को लेकर राय बनवाते हैं। 2.70 लाख कर्मचारियों की संख्या काफी बड़ी है। साथ ही कर्मचारी अपने आश्रितों के अलावा आस पड़ोस के अलावा अन्य लोगों से भी जुड़ा है। इसलिए यह मुद्दा हर कर्मचारी और उसके परिवार को प्रभावित करता है। क्योंकि कर्मचारी वर्ग का मतदान में अहम रोल होता है, इसलिए इसकी गंभीरता अधिक है।
पड़ोसी राज्यों का भी असर
पड़ोसी राज्य हिमाचल में 1972 के पेंशन रूल के अनुसार ओपीएस को न केवल लागू किया गया है, बल्कि इसका कर्मचारियों को लाभ भी मिलना शुरू हो गया है। हिमाचल में अभी तक 4500 कर्मचारियों को इस लाभ मिल चुका है। कर्मचारी ओपीएस के तहत आए हैं, उनको जीपीएफ नंबर भी मिल चुके हैं। हिमाचल हरियाणा के साथ लगता राज्य है। हिमाचल में कांग्रेस ने ओपीएस बहाली का नारा दिया था और इसी दम पर कांग्रेस की सरकार बनी है। इसलिए हरियाणा के कर्मचारी उत्हासित हैं कि यह चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसी प्रकार, अन्य पड़ोसी राज्य पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी ओपीएस को लागू किए जाने की घोषणाएं की जा चुकी हैं, हालांकि पंजाब और राजस्थान में अब इसे बंद कर दिया है।
अब तक ये हुए प्रयास
इस मामले में मुख्यमंत्री द्वारा पुरानी पेंशन बहाली संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों से 20 फरवरी को बैठक की थी। इसके बाद मुख्य सचिव की अध्यक्षता में तीन बड़े अधिकारियों की कमेटी गठित की गई थी। इनमें वित्त विभाग के एसीएस भी शामिल हैं। इस कमेटी के साथ संघर्ष समिति की केवल एक बैठक हुई है। अधिकारियों ने समिति के सदस्यों से पूरा डाटा मांगा था और समीक्षा करने के लिए समय मांगा था। इसके बाद समिति को नहीं बुलाया गया। इस बारे में समिति के राज्य प्रधान विजेंद्र धारीवाल ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में ओपीएस के लिए कर्मचारी अपनी लड़ाई जारी रखेंगे और सरकार के खिलाफ मुहिम जारी रखेंगे।
ओल्ड और न्यू पेंशन स्कीम में दिन और रात का अंतर है। न्यू पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर 1700 रुपये तक की पेंशन मिल रही है, जबकि ओपीएस की बात करें तो 10 गुणा अधिक हो जाती है। न्यू पेंशन स्कीम में संशोधन के नाम पर केंद्र सरकार ने एक कमेटी का गठन किया हुआ है। इसी प्रकार, हरियाणा सरकार ने भी एक समीक्षा कमेटी बनाई है, लेकिन यह केवल मामले को ठंडा करने के लिए किया गया है। ओपीएस बड़ा मुद्दा है और लोकसभा चुनावों में इसका साफ असर दिखेगा।
-सुभाष लांबा, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, सर्व कर्मचारी संघ
प्रदेश सरकार कर्मचारी हितैषी सरकार है। कर्मचारियों के प्रदेश सरकार ने कैशलेस इलाज सुविधा के अलावा कई अहम फैसले किए हैं। जहां तक ओपीएस की बात है तो यह केंद्र का मामला है। केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में कमेटी गठित की हुई है, उसी रिपोर्ट के आधार पर आगामी फैसला होगा।
-सुदेश कटारिया, मीडिया कार्डिनेटर, मुख्यमंत्री हरियाणा
कांग्रेस की सरकार बनते ही प्रदेश में ओपीएस की बहाली की जाएगी। हिमाचल और छत्तीसगढ़ सरकारें ऐसा कर चुकी हैं, प्रदेश सरकार मामले को लटकाने के लिए इसे केंद्र का मामला बता रही है। न्यू पेंशन स्कीम कर्मचारियों के साथ धोखा है और इससे उनका आर्थिक नुकसान हो रहा है।
-भूपेंद्र सिंह हुड्डा, नेता प्रतिपक्ष