पठानकोट हमले के बाद से ही सेना में बदले का लावा धधक रहा था। उसके बाद उड़ी हमला हो गया, इसके अलावा भी पाकिस्तान ने कई बार भारतीय सेना के जवानों को निशाना बनाया। परिस्थितियों को देखते हुए उड़ी हमले के तुरंत बाद ही सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला ले लिया गया था। दस दिन तक प्लानिंग चली और 29 सितंबर, 2016 को सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को सबक सिखाते हुए सवालों का जवाब दे दिया गया था।
ये बातें सर्जिकल स्ट्राइक की निगरानी करने वाले तत्कालीन नॉर्दर्न कमांड के जनरल आफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा (रिटायर्ड) ने अमर उजाला से खास बातचीत में साझी कीं। वे यहां मिलिट्री लिटरेचर फेस्ट-2018 में शामिल होने आए थे।
लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा ने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन को सार्वजनिक किया गया, यह सरकार का फैसला था, लेकिन मेरा मानना है कि इस ऑपरेशन का अब राजनीतिकरण ठीक नहीं है। सेना बहुत से ऑपरेशन करती रहती है, लेकिन इन सैन्य अभियानों का इस्तेमाल यदि राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया जाए, तो ये देश और सेना दोनों के लिए उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक और आर्मी के मुद्दों को अलग-अलग ही रखना बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि सभी सैन्य ऑपरेशन्स को भी सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं होती, लेकिन इस ऑपरेशन की परिस्थितियों ऐसी थी कि इसे सार्वजनिक करना पड़ा। क्या केंद्र सरकार इस ऑपरेशन के लिए राजी थी, इस सवाल के जवाब में लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा ने कहा कि सैन्य अभियानों को चलाना आर्मी का फैसला होता है, लेकिन इस तरह के बड़े अभियानों पर मुहर प्रधानमंत्री ही लगाते हैं।
हुड्डा का कहना है कि एलओसी पर हमारे जवान शहीद होते हैं तो पूरा देश शोक मनाता है, लेकिन पाकिस्तान सीमा पर शहीद होने वाले जवानों को कभी क्लेम नहीं करता। वर्ष 2017 में पाक सराकर ने पाकिस्तानी सेना से एलओसी पर शहीद होने वाले जवानों का डाटा मांगा था, जिसे देने से पाकिस्तान से अपनी सरकार को ही इनकार कर दिया था। पाक सेना हमेशा अपनी सरकार पर दबाव बनाकर रखना चाहती है, यह सारी दुनिया जानती है।