हॉकी में मौजूदा समय में टीम इंडिया के डिफेंडर और ओलंपियन संजय कुमार चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जबकि बलजीत सिंह जो टीम इंडिया के लिए गोलकीपर की भूमिका अदा कर चुके हैं, वह भी चंडीगढ़ के खिलाड़ी रहे हैं। खिलाड़ियों की इन उपलब्धियों ने चंडीगढ़ हॉकी एसोसिएशन की प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया है।
नौकरी पॉलिसी न होने की वजह से पंजाब और हरियाणा चले जाते खिलाड़ी
चंडीगढ़ खेल नीति में मौजूदा समय नौकरी देने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में हॉकी समेत ज्यादातर खेलों से जुड़े खिलाड़ी चंडीगढ़ में सीखने के बाद पंजाब और हरियाणा का रुख कर लेते हैं। चंडीगढ़ हॉकी एसोसिएशन के वाइस-प्रेसिडेंट अनिल बोरा का कहना है कि चंडीगढ़ में खेलों की सुविधाएं बेहतर हैं और प्रतिभाशाली खिलाड़ी लगातार निकलते हैं। समस्या यह है कि यहां की खेल नीति खिलाड़ियों को नौकरी की गारंटी नहीं देती। यहां इनामी राशि तो हरियाणा और पंजाब के बराबर मिल जाती है, लेकिन रोजगार न मिलने की वजह से खिलाड़ी मजबूर होकर दूसरे राज्यों का रुख कर लेते हैं। यही कारण है कि कई खिलाड़ी चंडीगढ़ से निकलने के बावजूद बाद में हरियाणा या पंजाब का प्रतिनिधित्व करने लगे। उन्होंने बताया कि इसको लेकर पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया से बात की गई है कि यहां के खिलाड़ियों को नौकरी का प्रावधान दिया जाए।
रणजी से एक भी खिलाड़ी टीम इंडिया तक नहीं पहुंचा
साल 2019 में चंडीगढ़ की रणजी टीम तैयार हो गई थी। लेकिन छह साल में एक भी बड़ा खिलाड़ी यहां से नहीं निकला। अर्शदीप सिंह चंडीगढ़ के रहने वाले हैं लेकिन वह रणजी में पंजाब से खेलते हैं। इसी तरह मौजूदा टेस्ट टीम में टीम इंडिया के कप्तान शुभमन गिल ने भी मोहाली से क्रिकेट खेला है। सेक्टर-16 स्टेडियम से एक समय युवराज सिंह और उससे पहले कपिल देव जैसे बड़े खिलाड़ी क्रिकेट सीखकर आगे निकले हैं। हाल ही में दिलीप ट्रॉफी का चयन हुआ तो उसमें भी चंडीगढ़ से कोई खिलाड़ी नहीं चुना गया। केवल एक खिलाड़ी को अतिरिक्त खिलाड़ी के तौर पर टीम में जगह दी गई।