महज 3 दिनों में उसे ऑक्सीजन से हटा दिया गया। थैरेपी का परिणाम इतनी तेजी से सामने आ रहा था कि महज 11 दिन में वह मरीज आईसीयू से निकलकर घर जाने की स्थिति में पहुंच गया। ट्रायल में आईसीयू, एनेस्थीसियोलॉजी, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन, वायरोलॉजी, सामुदायिक चिकित्सा, जन स्वास्थ्य और एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की अहम भूमिका है।
गंभीर मरीजों की है कमी
पीजीआई के डीन एकेडमी डॉ. जीडी पूरी ने बताया कि आईसीएमआर के मानकों के अनुसार मरीजों का न मिलना इस ट्रायल की गति को धीमी कर रहा है। पीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के डॉक्टरों की टीम ट्रायल करने में जुटी हुई है। मानकों के अनुसार कोरोना के जिन मरीजों में कफ, बुखार के साथ ही ऑक्सीजन लेने में परेशानी हो, उन्हें ही ट्रायल में शामिल किया जा सकता है।
इस मानक के कारण पीजीआई में भर्ती लगभग 99% मरीज रिजेक्ट हो चुके हैं। वहीं, प्लाज्मा डोनरों के साथ भी ऐसे ही मानकों को शामिल किया गया है, जिसके अनुसार वह मरीज ही अपना प्लाज्मा डोनेट कर सकते हैं, जिन्हें कोरोना पॉजिटिव होने के दौरान कफ, बुखार और सांस लेने में तकलीफ थी। जिन 7 मरीजों ने पीजीआई को अपना प्लाज्मा डोनेट किया है, वह सभी इस मानकों में खरे उतरे हैं।
कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा थैरेपी के ट्रायल की अनुमति मिलने के बाद पीजीआई को अब तक कोरोना के ठीक हो चुके 7 मरीजों ने अपना प्लाज्मा डोनेट किया है। पीजीआई ने उसे सुरक्षित कर लिया है।
कोरोना का मरीज ही दूसरे मरीज की बनेगा दवा
डॉ. जीडी पुरी ने बताया कि प्लाज्मा थैरेपी एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए एक ठीक हुए मरीज के शरीर से एंटीबॉडी यानी कि रोग प्रतिकारक को कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज के अंदर ट्रांसफर कर दिया जाता है। यह कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज के अंदर प्रवेश करने के बाद वायरस के कीटाणुओं से लड़ता है और मरीज को वायरस से बचाता है।
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प्लाज्मा थैरेपी का पहले भी रहा है बेहतर परिणाम
कोरोना के इलाज के लिए ट्रायल की अनुमति मिलने से पहले भी प्लाज्मा थैरेपी से कुष्ठ रोग जैसी कई प्रकार की गंभीर बीमारियों को कंट्रोल करने में अच्छा परिणाम सामने आया है। ऐसे में प्लाज्मा थैरेपी से कोरोना के एक बेहद गंभीर मरीज के ठीक होने से कोरोना के इलाज को लेकर सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।