केरल ने समय रहते इस समस्या को गंभीरता से लेकर बचाव पर फोकस कर सफलता प्राप्त कर ली है। प्रो. अरुण कुमार बरनवाल ने बताया कि अध्ययन में यह बात सामने आई है कि केरल ने जन्मजात हृदय रोग पर काबू पाने के लिए पिछले चंद वर्षों में महत्वपूर्ण बदलाव कर बेहतर परिणाम हासिल किए हैं। अगर केरल का 1991 से 2015 तक का आंकड़ा देखा जाए तो जन्मजात हृदय रोग से ग्रस्त बच्चों का दर 12 से 20 प्रतिशत के बीच था। इसके बाद 2016 में हृदयम योजना लागू की गई। ऐसे बच्चों को चिह्नित कर समय रहते सरकारी दर पर बेहतर इलाज मुहैया कराना शुरू किया गया। परिणामस्वरूप 12 से 20 के बीच रहने वाला दर 6 प्रतिशत पर आ गया है।
आंकड़े स्थिति की भयावहता कर रहे बयां
क्षेत्र प्रतिवर्ष मरीजों की संख्या प्रभावित प्रदेश
उत्तरी भारत 84,000 जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़
पूर्वी भारत 52,000 बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल
दक्षिणी भारत 38,000 तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल
पश्चिमी भारत 29,000 महाराष्ट्र, गुजरात
मध्य भारत 23,000 मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान
उत्तर-पूर्वी भारत 12,500 असम, सिक्किम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा
नोट- इनमें से लगभग 25 प्रतिशत बच्चों में क्रिटिकल सीएचडी यानी जीवन के पहले वर्ष में इलाज की आवश्यकता होती है।
हमारा प्रयास है कि जन्मजात हृदय रोग से ग्रस्त बच्चों को समय रहते सर्जरी कर बेहतर जीवन जीने में सहयोग करें, लेकिन इसके लिए व्यापक स्तर पर कार्य योजना तैयार कर उसके आधार पर काम करने से ही सफलता प्राप्त हो सकेगी। -प्रो. अरुण कुमार बरनवाल, पीजीआई एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर।