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विश्व में पहली बार: पीजीआई चंडीगढ़ ने किया कमाल, एक ही जांच से पेट की टीबी और दवा के प्रभाव का पता लगाया

Sun, 01 Oct 2023 04:38 PM IST
ajay kumar वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि लाइन प्रोब एसेस टेस्ट से यह संभव हो पाया है। इस शोध के दौरान 2012 से 2022 के बीच ऐसे 30 मरीजों को शामिल किया गया। उन मरीजों में नए मॉलिक्यूल तकनीक वाले जांच लाइन प्रोब एसेस की मदद से अलग-अलग स्तर पर संक्रमण की जांच की गई। साथ ही उसी जांच के जरिए गंभीर मरीजों पर दवा के असर के परिणाम का भी पता लगाया गया।
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पीजीआई चंडीगढ़।
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विस्तार
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चंडीगढ़ पीजीआई के विशेषज्ञों ने पेट की टीबी के मरीजों की जांच की राह आसान कर दी है। अब इस बीमारी मरीजों का इलाज लक्षण के आधार पर नहीं बल्कि जांच रिपोर्ट के मुताबिक किया जाएगा। अब तक पेट के टीबी के मरीजों का इलाज लक्षण के आधार पर ही किया जा रहा था। ऐसे में यह बड़ी उपलब्धि है।

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यही नहीं, एमडीआर यानी मल्टीड्रग रजिस्टेंस वाले टीबी के मरीजों पर दवा कारगर होगी कि नहीं, इसका पता लगाना भी पीजीआई के विशेषज्ञों ने बेहद आसान कर दिया है। पीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने 10 वर्षों के शोध के बाद इन दोनों समस्याओं का समाधान तलाश लिया है। इस शोध से टीबी उन्मूलन अभियान को सफल बनाने में भी काफी मदद मिलेगा क्योंकि सिर्फ भारत में ही नहीं विश्व में एमडीआर टीबी का इलाज परेशानी का सबब बना हुआ है।

इस शोध के विशेषज्ञ व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि लाइन प्रोब एसेस टेस्ट से यह संभव हो पाया है। इस शोध के दौरान 2012 से 2022 के बीच ऐसे 30 मरीजों को शामिल किया गया। उन मरीजों में नए मॉलिक्यूल तकनीक वाले जांच लाइन प्रोब एसेस की मदद से अलग-अलग स्तर पर संक्रमण की जांच की गई। साथ ही उसी जांच के जरिए गंभीर मरीजों पर दवा के असर के परिणाम का भी पता लगाया गया जबकि इससे पहले तक ऐसे मरीजों का लक्षणों के आधार पर ही इलाज किया जा रहा था। इस जांच की वैद्यता 90 प्रतिशत है जबकि इसकी जगह पर माइक्रोस्कोप से की जाने वाली जांच की सफलता दर बेहद कम है।

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एमडीआर टीबी आप भी जान लें

टीबी के लिए सबसे अधिक प्रभावकारी दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए तो इसे मल्टीड्रग रजिस्टेंस टीबी या एमडीआर टीबी कहते हैं। ऐसे मरीजों पर दवा असर नहीं करती।

पेट की टीबी को जानिए

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल टीबी पेट के पेरिटोनियम और लिंफ में होती है। इसमें माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस का संक्रमण हो जाता है। देश में छोटी आंतों में होने वाले इस तरह के टीबी मरीजों की संख्या कुल टीबी के मरीजों की कुल संख्या का 5 से 9 प्रतिशत है। टाइफाइड बुखार के बाद भारत में आंतों में होने वाली यह दूसरी सबसे आम बीमारी है। मधुमेह और एचआईवी पॉजिटिव रोगियों में इस बीमारी के होने का जोखिम सबसे ज्यादा रहता है।
 
विश्व में टीबी उन्मूलन पर काफी काम हो रहा है। ऐसे में एमडीआर टीबी के मरीजों पर दवा के रजिस्टेंस की जानकारी देने से संबंधित शोध बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी खास बात यह है कि हमने एक ही प्रक्रिया में दो बेहद महत्वपूर्ण चीजों की जानकारी प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर ली है। इसके कारण यह शोध विश्वभर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। - डॉ. एसके सिन्हा, पीजीआई गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग।
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