पदमश्री शेखर सेन ने कहा कि ‘हिंदुस्तान में सबसे बड़ी दिक्कत है कि यहां लोग जरूरत से अधिक जानते हैं। लेकिन कई बार अधिक उजाला भी इंसान को अंधा कर देता है। सफलता का स्वाद तभी महसूस किया जा सकता है जब उसने असफलता का दर्द झेला हो। यही सफलता का असल मूल मंत्र है।’
देश विदेश में कबीर और तुलसीदास जैसे नाटकों को पेश करने वाले पदमश्री शेखर सेन ने पंजाब यूनिवर्सिटी में युवाओं को जिंदगी से जुड़े कई पहलुओं से रूबरू करवाया। लेखक, गीतकार, संगीतकार और अभिनेता शेखर सेन शुक्रवार दोपहर बाद पीयू की ओर से आयोजित क्लोकियम सीरीज के तहत कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे ।
शेखर सेन ने ‘मेरी कलायात्रा’ शीर्षक पर कहा कि जिस देश या समाज में कल्चर की अनदेखी होती है, उसकी हालत पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों जैसी होती है। जो अपनी हस्ती को बचाने के लिए भी संघर्ष करते हैं। उन्होंने कहा कि कल्चर से दूर होते पाकिस्तान में आज एक भी नया क्लासिकल गायक नहीं उभरा है। उन्होंने कहा कि कल्चर की अनदेखी वल्चर को बुलावा देने जैसी होती है।
शेखर ने मुंबई के मुश्किलों भरे सफर को युवाओं के साथ सांझा किया। कभी मुंबई के गुरुद्वारे में गीत सुनाकर जीवन बसर करने वाले शेखर ने युवाओं को कहा कि खुद की ताकत को पहचानो और खुद की पहचान बनो। देश दुनिया में 2700 से अधिक नाटकों की प्रस्तुति दे चुके शेखर ने कहा कि हर इंसान में अलग खूबी होती है। बस उसे खुद को धातु की तरह पहचानने की जरूरत है। वह खुद को तांबा धातु की कैटेगरी में मानते हैं। अगर एक दिन भी तांबे के बर्तन नहीं धोए तो वह काला पड़ जाता है, लेकिन उसे रोज धोया जाए तो सोने से भी ज्यादा चमकता है। इस फार्मूले को वह अपने जीवन में अपनाते हैं।
खास अंदाज में शेखर ने युवाओं को खुद की प्रतिभा को निखारने के कई मंत्र दिए। उन्होंने अपने जीवन के कड़े दौर की यादों को साझा किया। नाटक के निर्देशन के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो पत्नी के गहनों का भी सौदा करना पड़ गया।