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मंजिल पे ला के जो मुझे खुद आप खो गया...

Fri, 21 Mar 2014 02:31 PM IST
सर्वेश कुमार/अमर उजाला, पंचकूला
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लाऊं कहां से ढूंढ के उस रहनुमा को मैं, मंजिल पे ला के जो मुझे खुद आप खो गया...।
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1950 के दशक को याद करते हुए पद्मश्री डॉ. सरदार अंजुम ने इन्हीं पंक्तियों के जरिये मशहूर पत्रकार, उपन्यासकार एवं लेखक खुशवंत सिंह को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि जिस्मानी सफर खत्म कर, अब वह रूहानी सफर के लिए निकल पड़े हैं।
बचपन को याद करते हुए पद्मश्री डॉ. सरदार अंजुम ने कहा कि करीब 10 के उम्र में नई दिल्ली स्थित खुशवंत सिंह के घर ‘बैकुंठ’ में ‘जवान बचपन’ गुजारा, जहां उनके पिता सर शोभा सिंह भी रहते थे।
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इसी दौरान एक बार खुशवंत सिंह जी के सामने शेर पेश किए कि ‘कहो तारीकियों से और भी संगीन हो जाएं, हमें ये देखना है हम कहां तक दिल जलाते हैं’।

यह सुनने के बाद खुशवंत सिंह ने सवाल किया-अपनी उम्र देखी है? बचपन में शुरू हुए मुलाकात का यह सिलसिला मुंबई तक भी बदस्तूर जारी रहा।

एक वाकये का जिक्र करते हुए डॉ. अंजुम ने कहा कि खुशवंत सिंह जी ने मेरे बारे में फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा से तारीफ की और बताया कि मेरा पुत्तर वी इत्थे रैंदा...।

इसके बाद मुझे उनसे मुलाकात कराने के लिए खुशवंत सिंह ने कहा कि यश मुझे पांचवें फ्लोर पर उतार रहे हैं, मैं उन्हें सातवें फ्लोर पर चढ़ाना चाहता हूं। थोड़ी देर बाद यश चोपड़ा के घर से सातवीं मंजिल पर खाना पहुंचाया गया।

इस बात में बेहद संजीदगी थी, इसके बाद से तीनों के बीच की बुनियाद काफी दूर तक गईं और मजबूत बन गईं। पद्मश्री डॉ. सरदार अंजुम ने कहा कि खुशवंत सिंह न केवल प्रतिभा के धनी थे, बल्कि उनकी सोच और विचार का कोई सानी नहीं है।
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उनके छोटे भाई दलजीत सिंह ने पहली बार खुशवंत सिंह जी से मुलाकात करवाई थी। कई बार उनसे मिले और हर बार उन्होंने हौसला बढ़ाते हुए तारीफ की। उनके साथ शुरू हुए सफर की यादें अब भी कसौली की वादियों में बादलों के साथ होंगी।
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