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Chandigarh News: हड्डी रोग विशेषज्ञ महिला डॉक्टरों को मेहनत में पुरुषों से कम आंकते हैं

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चंडीगढ़। मेडिकल क्षेत्र में बढ़ती जेंडर डाइवर्सिटी के बावजूद ऑर्थोपेडिक सर्जरी पुरुष-प्रधान बनी हुई है। इंडियन जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक्स में प्रकाशित पीजीआई के शोध से पता चला कि 226 पुरुष ऑर्थोपेडिक सर्जनों में से 74.8% ने माना कि महिलाएं समान रूप से सक्षम हैं फिर भी 34.5% ने असिस्टेंट के रूप में पुरुष को ही प्राथमिकता दी जबकि सिर्फ 2.2% ने महिलाओं को चुना।
शोध में शामिल डॉक्टरों की औसत उम्र 51 साल रही, जिनमें 55% के पास 11–30 साल का अनुभव था। नतीजों से स्पष्ट हुआ कि 30 साल से अधिक अनुभव वाले डॉक्टर महिलाओं को कम सक्षम मानने की प्रवृत्ति रखते हैं।
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शोध का विवरण
पीजीआई के पूर्व विभाग प्रमुख व हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सिंह ढिल्लों ने बताया कि शोध में देश भर के अलग-अलग जगहों के डॉक्टरों से 30 सवाल पूछे गए। सवाल मुख्यतः कार्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और प्रदर्शन पर केंद्रित थे। कई डॉक्टरों ने माना कि महिलाएं ऑर्थोपेडिक में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकतीं, जबकि अन्य विभागों में उनके प्रदर्शन को सराहा गया। डॉ. ढिल्लों ने कहा कि यह धारणाएं गलत हैं और पुरुष डॉक्टरों को सोच बदलने की जरूरत है।

महिलाएं ईमानदारी और नैतिकता में आगे
शोध में शामिल पुरुषों ने महिलाओं को ईमानदारी, समझदारी और नैतिकता से जोड़ा, जबकि पुरुषों को ताकत और शारीरिक कार्य क्षमता से। महिला ऑर्थोपेडिक प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण में सीधी आलोचना झेलने और अनुकूलन में कठिनाई जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

समाधान के सुझाव
विशेषज्ञों ने कहा कि यह प्रणालीगत पूर्वाग्रह को दर्शाता है। इसे बदलने के लिए महिला रोल मॉडल्स और मेंटरशिप बढ़ाना, जेंडर डाइवर्सिटी को प्रोत्साहित करना और प्रशिक्षण माहौल को समावेशी बनाना जरूरी है।
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शोध टीम और प्रकाशन
यह शोध पीजीआई के पूर्व प्रमुख डॉ. मंदीप सिंह ढिल्लों, डॉ. सिद्धार्थ शर्मा, डॉ. मेहर ढिल्लों, डॉ. निराली मेहता (मोहाली) और डॉ. रुजुता मेहता (बीजे वाडिया हॉस्पिटल, मुंबई) ने मिलकर किया। यह 27 सितंबर 2025 को इंडियन जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक्स में प्रकाशित हुआ।
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