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चंडीगढ़ लिट्रेचर फेस्टिवलः इस दिग्गज ने कहा- भंसाली की पद्मावत से कहां चला गया हीरामन

Sat, 03 Nov 2018 05:28 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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चंडीगढ़ लिट्रेचर फेस्टिवल
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आखिरकार पद्मावत से हीरामन कहां चला गया। वास्तव में कई ऐसे पहलू होते हैं जिनको फिल्मों में समाहित करना मुश्किल हो जाता है। इसके कई कारण भी हो सकते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने चंडीगढ़ लिट्रेचर फेस्टिवल (सीएलएफ) में अपनी किताब पद्मावत के विश्लेषण के दौरान यह बात कही। समापन मुंबई के तमाशा समूह की एक प्रस्तुति से हुआ, जिसकी थीम थी- ‘उर्दू है जिसका नाम’।

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चंडीगढ़ के गवर्नमेंट कॉलेज फार गर्ल्स सेक्टर-11 में आयोजित सीएलएफ के दौरान पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा लिखी गई किताब ‘पद्मावत’ के विश्लेषण पर रहा। इसमें आलोचक कृष्ण कुमार ने भाग लिया। इस मौके पर लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि महाकाव्य मूल रूप से मलिक मोहम्मद जायसी ने लिखा था। जब यह सवाल पूछा गया कि क्या फिल्म महाकाव्य या ऐतिहासिक घटनाओं की संवेदनशीलता को चित्रित करने का एक उचित माध्यम थी।

इस बारे में उन्होंने कहा कि फिल्मों की अपनी मजबूरी है। कई स्थानों पर फिल्में वित्तीय मजबूरी की वजह से मूल रचना में व्यक्त सार पर ध्यान नहीं देती हैं। उन्होंने कहा कि हीरामन का करेक्टर भंसाली के पद्मावत में कहीं नहीं दिखाया गया है, जबकि उनका पालतू तोता हीरामन ही पद्मावती का सलाहकार था और वह मौजूदा परिदृश्य में काफी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि फिल्मीकरण करने पर थोड़ा स्वरूप तो बदल ही जाता है।
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दूसरे सत्र में, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता पारो आनंद की किताब ‘द अदर’  पर आलोचक स्वाति ने उनके बातचीत की। ‘द अदर’ निराशा भरी, परंतु उत्साह जगाने वाली कहानियों का संकलन है जो आज के किशोरों के दिलों और दिमागों का एक चित्रण है। ‘द अदर’ उन मुद्दों को पकड़ती है, जिनका हम आमतौर पर सामना करने से डरते हैं।

ये कहानियां युवा होते बच्चों के साथ हुई बातचीत पर आधारित हैं और युवाओं को उदासीनता के बजाय सहानुभूति अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसमें लेखक ने अपनी कहानियों के निष्कर्ष साझा किए। इसमें जटिल पर वास्तविक अनुभवों की एक विस्तृत और रोचक श्रृंखला है जो पाठकों को वर्तमान युग की वास्तविकता को स्वीकार करने और उनका सामना करने के लिए मजबूर करती है।

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किशोरों का चित्रण करती है ‘द अदर’

पारो आनंद
मुजफ्फरनगर ने जीत लिया दिल
तीसरे सत्र में आलोचक ओमैर अहमद ने ‘मुजफ्फरनगर में दिवाली’ किताब के लेखक तनुज सोलंकी के साथ बातचीत की। तनुज सोलंकी ने कहा कि इस किताब में उन्होंने मुजफ्फरनगर के बारे में और उसके आसपास की छोटी कहानियों के बारे में लिखा है। यह शहर के लोगों के दृष्टिकोण से लिखी गयी हैं, आखिरकार इसे थोड़ी दूरी से देखने और इन कहानियों के माध्यम से अपनी यादों को साझा करने की कोशिश की गई है। वे इस छोटे से शहर को उन लोगों के अनुभवों के माध्यम से सामने लाते हैं, जिनके अतीत इस शहर से वास्ता रखता है।
 
जल थल मनपर हुआ मंथन
‘जल थल मल’ किताब के लेखक सोपान जोशी को सौरभ द्विवेदी के साथ बातचीत करते हुए देखा गया। इसके बाद, ई-बुक ‘एक थी मैना, एक था कुम्हार’ के लेखक हरि भटनागर की आलोचक विभूति नारायण राय के साथ बातचीत हुई। पुस्तक ‘द वाइल्डिंग्स’ की लेखक निलंजना रॉय और आलोचक रिहान नजीब के बीच भी वार्तालाप का एक दिलचस्प सत्र हुआ।

अंतिम दिन का आकर्षण होंगे अशोक वाजपेयी
‘सीएलएफ  के अंतिम, ‘द डॉटर्स ऑफ द सन’, ‘द एपिक सिटी- द वर्ल्ड ऑन द स्ट्रीट्स ऑफ कोलकाता’, ‘ग्यारवी-ए के लड़के’ और ‘बल्लाड ऑफ काजीरंगा’ जैसी किताबों पर चर्चाएं होंगी। इतना ही नहीं, कविताओं पर आधारित एक कार्यक्रम ‘अनुवाद संवाद - अनुवाद में विश्व कविता’ भी आयोजित किया जायेगा।
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