एडवोकेट अशोक सहगल ने याचिकाकर्ता बुजुर्गों की ओर से सिविल कोर्ट में तामील याचिका दायर कर साल 2018 में जारी सिविल कोर्ट के आदेश का पालन कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने जानबूझकर वर्ष 2018 में उनके हक में हुए फैसले का पालन नहीं किया। इस पर अदालत ने डीसी और वित्त सचिव की सरकारी गाड़ी को कुर्क करने का आदेश दिया। अगर इसके बाद भी प्रशासन ने याचिकाकर्ताओं को बूथ आवंटित नहीं किए तो इन अफसरों की गाड़ियों की नीलामी भी की जा सकती है।
प्रशासन के फर्जी सर्वे ने किया योजना से बाहर
याचिकाकर्ता पक्ष के वकील अशोक सहगल ने अपनी याचिका में बताया है कि तीनों पीड़ित सेक्टर-22 की बजवाड़ा मार्केट में फल-सब्जी विक्रेता का काम करते थे। प्रशासन की ओर से मार्केट में काम करने वाले अन्य लोगों की तरह उन्हें भी हॉकर लाइसेंस दिए गए थे। प्रशासन ने हॉकर लाइसेंस धारकों को योजना के तहत बूथ आवंटित करने थे लेकिन प्रशासन में बैठे अधिकारियों ने अपने चहेतों को बूथ देने के लिए वर्ष 1994 में एक बार फिर से सर्वे करवाया।
आरोपों के तहत प्रशासन की ओर से सर्वे के लिए जानबूझकर सोमवार का दिन रखा गया, जब मार्केट बंद थी। इसके चलते सर्वे के वक्त केवल कुछ ही दुकानदार सब्जियां और फल लगाकर बैठे थे। प्रशासन ने इसी सर्वे को आधार बनाते हुए कुछ लोगों को बूथ आवंटित कर दिए जबकि कई योग्य लोगों को इस योजना से बाहर कर दिया। प्रशासन के इस सर्वे के खिलाफ तीनों याचिकाकर्ताओं ने कई शिकायतें दीं। इस कारण से उन्हें आज तक बूथ नहीं मिला। करीब 29 वर्ष पुराने इस मामले में अब तीनों याचिकाकर्ताओं की उम्र 70-75 साल के करीब हो चुकी है। प्रशासन के इसी रवैये के चलते याचिकाकर्ता अपने हक के लिए भटकते आ रहे हैं।