अमृतसर से कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल द्वारा उन पर आपरेशन ब्लूस्टार और नशा तस्करी में शामिल होने संबंधी लगाए आरोपों पर हंसी उड़ाई है।
कैप्टन ने बयान जारी कर कहा कि वह आपरेशन ब्लूस्टार के बारे में सुखबीर में ज्ञान की कमी को समझ सकते हैं, क्योंकि इस दौरान वह अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में मौज कर रहे थे।
उन पर नशा तस्करी करने संबंधी गंभीर आरोप लगाने वाले सुखबीर की निंदा करते हुए कैप्टन ने कहा कि सुखबीर गृह मंत्री हैं और उनको मुझ पर आरोप लगाने की जगह कार्रवाई करनी चाहिए। गृह मंत्रियों से आरोप लगाने की जगह कार्रवाई करने की उम्मीद की जाती है।
इंदिरा गांधी का फैसला गलत था
कैप्टन ने कहा कि सबको पता है कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा श्री दरबार साहिब पर सेना भेजने संबंधी लिया गया फैसला गलत था। उन्होंने भी इस फैसले का विरोध किया था और अब भी विरोध करते हैं। परंतु सुखबीर के पिता प्रकाश सिंह बादल ने केंद्रीय गृह मंत्री पीवी नरसिम्हा राव के साथ बैठक करके आपरेशन के लिए अपनी मंजूरी दी थी। आज तक बादल ने इस बारे अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है।
उन्हाेंने भाजपा की भूमिका पर प्रतिक्रिया जाहिर की, जिसने श्रीमती गांधी पर कार्रवाई करने का दबाव बनाया था, जिसका खुलासा आडवाणी ने अपनी किताब माई कंट्री माई लाइफ में किया है। उन्होंने सोचा था कि सुखबीर अपने भ्रम से बाहर निकल आए हैं, लेकिन अब मुझे अपनी सोच को विचारना होगा।
ऑपरेशन ब्लूस्टार का असर
भारत सरकार के श्वेतपत्र के अनुसार, ऑपरेशन ब्लू स्टार में 83 सैनिक मारे गए और 249 घायल हुए। इसी श्वेतपत्र के अनुसार 493 चरमपंथी या आम नागरिक मारे गए, 86 घायल हुए और 1592 को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन इन सब आंकड़ों को लेकर अब तक विवाद चल रहा है।
सिख संगठनों का कहना है कि हज़ारों श्रद्धालु स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद थे और मरने वाले निर्दोष लोगों की संख्या भी हज़ारों में है। इसका भारत सरकार खंडन करती आई है।
इस कार्रवाई से सिख समुदाय की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंची। कई प्रमुख सिख बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाए कि स्थिति को इतना ख़राब क्यों होने दिया गया कि ऐसी कार्रवाई करने की ज़रूरत पड़ी? सरकार की इस बर्बर कार्रवाई से खफा कई प्रमुख सिखों ने या तो अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया या फिर सरकार द्वारा दिए गए सम्मान लौटा दिए।
सिखों और कांग्रेस पार्टी के बीच दरार उस समय और गहरा गई जब दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने कुछ ही महीने बाद 31 अक्तूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। इसके बाद भड़के सिख विरोधी दंगों से कांग्रेस और सिखों की बीच की खाई और गहरा गई।
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बर्बरता: 5 जून 1984 का काला दिन
स्वर्ण मंदिर परिसर को बाहर से सेना ने चारों ओर से घेर रखा था। उधर, स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के लड़ाकों ने मोर्चाबंदी कर रखी थी।
इंदिरा गांधी ने सेना को स्वर्ण मंदिर परिसर में घुसने और ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाने का आदेश दे दिया। जिसके बाद वहां परिसर में भीषण खून-खराबा हुआ। सैन्य कमांडर केएस बराड़ ने माना कि चरमपंथियों की ओर से भी काफी तीखा जवाब मिला। अकाल तख़्त पूरी तरह तबाह हो गया।
स्वर्ण मंदिर पर भी गोलियां चलीं। कई सदियों में पहली बार वहां छह, सात और आठ जून को पाठ नहीं हो पाया। सिख पुस्तकालय जल गया।
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बगावत: एक जून से हो गई थी शुरुआत
ऑपरेशन ब्लू स्टार के हालात एक जून से ही बनने शुरू हो गए थे।
एक जून को स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात केंद्र रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स के बीच गोलीबारी हुई थी। स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के लड़ाकों ने चारों तरफ़ खासी मोर्चाबंदी कर रखी थी।
तीन जून को गुरु अर्जुन देव के शहीदी दिवस को लेकर हज़ारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जमा थे। उधर, तीन जून तक ही भारतीय सेना अमृतसर में प्रवेश कर गई थी और स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर चुकी थी। शाम में कर्फ़्यू लगा दिया गया था।
चार जून को सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी ताकि चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाज़ा लगाया जा सके।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार: कैसे बने हालात
ऑपरेशन ब्लू स्टार को जानने से पहले उन परिस्थतियों को जानना जरूरी है, जिसके कारण ये हालात पैदा हुए। पंजाब में हिंसा की शुरुआत 1978 में हुई थी। उसी समय सिख धर्म प्रचार संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले का चर्चा में आया।
1981 के बाद जब पंजाब में हिंसक गतिविधियां बढ़ने लगीं तो भिंडरांवाले के ख़िलाफ लगातार हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगने लगे, लेकिन पुलिस का कहना था कि उनके ख़िलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
अप्रैल 1983 में पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दिहाड़े हरमंदिर साहिब परिसर में गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस का मनोबल लगातार गिरता चला गया।
हिंदुओं का नरसंहार होता देखकर इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। पंजाब में स्थिति बिगड़ती चली गई। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार से तीन महीने पहले तक हिंसक घटनाओं में मरने वालों की संख्या 298 हो चुकी थी।
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ऑपरेशन ब्लू स्टारः एक सच यह भी
ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत सैन्य कार्रवाई शुरू करते वक्त केंद्र सरकार की ओर से दरबार साहिब परिसर में मौजूद अकाली नेताओं से कोई संपर्क नहीं साधा गया।
हालांकि, आपरेशन से पहले और बाद में केंद्र और अकालियों के बीच निरंतर बातचीत होती रही। एसजीपीसी के पूर्व अध्यक्ष स्व. गुरचरण सिंह टोहड़ा के जीवन पर लिखी एक पुस्तक में दर्ज ये तथ्य उस समय के हालात की परतें खोलते हैं कि कैसे तत्कालीन केंद्र सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की तैयारी करने के साथ-साथ अकालियों से टेबल टॉक भी जारी रखी।
प्रो. बलकार सिंह द्वारा ‘पंजाब दा बाबा बोहड़ गुरचरण सिंह टोहड़ा’ शीर्षक से लिखी इस किताब में टोहड़ा के हवाले से यह भी कहा गया है कि उस दौरान अकालियों का सियासी अक्स बिगाड़ने के केंद्रीय प्रयास भी लगातार जारी रहे।
ऑपरेशन के दौरान टोहड़ा ने कई लोगों को गुरुद्वारे में एसजीपीसी का कर्मचारी बताकर सेना से बचाया था। किताब में अकाली नेताओं को हिरासत में लिए जाने के तत्काल बाद उन पर दबाव बनाने की सरकारी कोशिशों का जिक्र भी है।
किताब के एक अध्याय में लिखा है ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत चार जून 1984 को सेना की कार्रवाई शुरू हुई, लेकिन उस दौरान श्री दरबार साहिब परिसर में उपस्थित अकाली लीडरशिप से कोई संपर्कनहीं साधा गया। उस समय अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लौंगोवाल सहित जत्थेदार टोहड़ा, बलवंत सिंह रामूवालिया, भान सिंह, अबिनाशी सिंह आदि वहां उपस्थित थे।
लगातार हो रही गोलीबारी से बने माहौल के बीच छह जून को संत लौंगोवाल सहित जत्थेदार टोहड़ा को बंदी बनाकर हवाई जहाज से अज्ञात स्थान पर ले जाया जा रहा था, तब विमान में मौजूद एक डीएसपी ने उनसे सहानुभूति प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से माफी मांगने की सलाह दी थी।
इस पर टोहड़ा और लौंगोवाल भड़क गए और उन्होंने डीएसपी को फटकार लगाई। बाद में पता चला कि डीएसपी को इसी काम के लिए विशेष रूप से भेजा गया था।
किताब के एक अन्य अध्याय में यह भी लिखा है कि अकालियों को जरनैल सिंह भिंडरावाला के साथ टकराव में लाने की कोशिश नाकाम रहने के कारण ही केंद्र सरकार ने सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुना।
किताब में 23 जनवरी और 26 मई 1984 की बैठकों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनमें अकालियों ने पंजाब संबंधी मांगों को इस हद तक कम कर दिया था कि उपस्थित केंद्रीय मंत्री और बड़े अधिकारी भी उनसे सहमत हो गए, लेकिन बाद में कहा गया कि ‘मैडम नहीं मान रहीं’।
किताब में यह खुलासा भी किया गया है कि जत्थेदार टोहड़ा को बतौर राज्यसभा सदस्य दिल्ली पर मिले आवास पर एक रात पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पहुंचे और उन्हें इंदिरा गांधी से मिलवाने की पेशकश की।
इस पर टोहड़ा ने साफ कर दिया कि वह अपने अध्यक्ष संत लौंगोवाल से आज्ञा लिए बिना ऐसा नहीं कर सकते। कुछ दिन बाद दो वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने भी टोहड़ा से मिलकर प्रधानमंत्री से मुलाकात करवाने की बात कही, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
संत लौंगोवाल की अगुवाई में इंदिरा गांधी के साथ इस दौरान अकाली नेताओं की एक बैठक हुई, लेकिन मसले का कोई हल नहीं निकल पाया और जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ।