चंडीगढ़ के जीएमसीएच-32 में मरीजों की भरमार से व्यवस्था चरमरा गई है। इमरजेंसी से गैलरी तक पैर रखने तक की जगह नहीं बची है। आलम यह है कि स्ट्रेचर से स्ट्रेचर सटे हैं। ग्लूकोज की बोतल को टांगने के लिए स्टैंड तक नहीं हैं। मरीजों को ड्रिप लगने के बाद परिजन हाथ में ग्लूकोज की बोतल लेकर खड़े हैं। एक-एक डॉक्टर दर्जनों मरीजों को देख रहे हैं। पैरामेडिकल स्टाफ भाग-भागकर मरीजों को दवा और इंजेक्शन दे रहे हैं।
स्ट्रेचर पर पड़े मरीज बेसुध हैं। उनके परिजन चिंतित। हर पल बस यही चिंता सता रही है कि पता नहीं उनका मरीज ठीक भी होगा कि नहीं क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर तो हैं लेकिन मरीजों को लिटाने के लिए बेड नहीं। स्ट्रेचर ही एकमात्र सहारा है क्योंकि इमरजेंसी में अलॉट चंद बेड तो कभी खाली होते ही नहीं। अस्पताल प्रशासन भी व्यवस्था सुधारने का प्रयास कर थक चुका है। रेफर मरीजों की भरमार से स्थिति नियंत्रण में आने का नाम नहीं ले रही है।
एनएस की बोतल को टांगने के लिए स्टैंड तक नहीं
जीएमसीएच-32 की इमरजेंसी की गैलरी में स्ट्रेचर पर लेटे एक मरीज का परिजन पास में ही खड़ा था। मरीज तो बेसुध था लेकिन परिजन हाथ में एनएस की बोतल को एक टक देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बोतल को कहां रखे। नर्स ने एनएस में दवा डालकर मरीज को ड्रिप लगाई और बोतल परिजन को थमा दी। बोतल टांगने के लिए स्टैंड तक उपलब्ध नहीं था। परिजन ड्रिप की एक-एक बूंद देखकर इस बात का संतोष कर रहा था कि जल्द ही दवा खत्म हो जाएगी और वह बोतल रख देगा।
इमरजेंसी में ऐसी भीड़, जैसे सब्जी मंडी हो
इमरजेंसी में लिफ्ट के पास ही कई कतार में स्ट्रेचर लगाए गए हैं। एक स्ट्रेचर से दूसरे स्ट्रेचर की दूरी एक इंच की भी नहीं है। भर्ती मरीजों को देखकर ऐसा लग रहा था कि अगर उनमें से एक ने भी करवट ली तो वे दूसरे के ऊपर ही आ जाएगा। इमरजेंसी में मरीजों व उनके परिजनों की भीड़ देखकर ऐसा लगा रहा था जैसे सब्जी मंडी हो। हर तरफ शोर और भागमभाग, कोई दर्द के मारे कराह तो कोई चीख रहा था। परिजन डॉक्टर को आवाज लगा रहे थे। परिजनों को इस बात का डर सता रहा था कि इस अव्यवस्था के बीच उनके मरीज को कोई और संक्रमण न हो जाए।
परेशानी का मुख्य कारण बनी बेड की कमी
जीएमसीएच-32 में मरीजों की संख्या चार गुना ज्यादा बढ़ गई है, लेकिन बेड की संख्या अब भी वर्षों पुरानी ही है। बेड की जगह स्ट्रेचर बढ़ते जा रहे हैं। आलम यह है कि मरीजों के दबाव के कारण स्ट्रेचर भी कम पड़ने लगे हैं। इमरजेंसी में कई ऐसे मरीज भी भर्ती हैं जिनका इलाज व्हीलचेयर पर चल रहा है, क्योंकि उनके लिए स्ट्रेचर ही नहीं बचा है।
प्रशासन गंभीरता से नहीं दे रहा ध्यान
ये अव्यवस्था का ही नतीजा है जो एक जगह मरीज स्ट्रेचर के लिए भी तरस रहे हैं और दूसरी जगह सेक्टर-48 के अस्पताल में दर्जनों बेड खाली हैं। प्रशासन इस समस्या को नजरअंदाज कर रहा है। इसे गंभीरता से लेना जरूरी है।
-आलोक सिंह, मलोया
सरकारी अस्पताल भगवान भरोसे
सरकारी अस्पताल भगवान भरोसे ही चलाए जा रहे हैं। मेरा मरीज जीएमसीएच-32 में पिछले 12 दिनों से भर्ती है। स्ट्रेचर पर लेटे लेटे मरीज की हालत और गंभीर हो गई है। अधिकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस अव्यवस्था को कोई देखने वाला नहीं है।
-नवीन कुमार, हल्लोमाजरा
रेफरल सेंटर होने के कारण यहां आसपास के प्रदेशों से आने वाले मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा है। अस्पताल प्रबंधन मरीजों की सुविधा को ध्यान में रखकर लगातार कार्य कर रहा है लेकिन अन्य प्रदेशों के सहयोग से ही इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
- डॉ. सुधीर गर्ग, चिकित्सा अधीक्षक जीएमसीएच-32
अस्पताल में क्रॉस इंफेक्शन का खतरा रहता है क्योंकि वहां अलग-अलग मर्ज और संक्रमण के मरीज एक ही छत के नीचे होते हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि एक मरीज से दूसरे मरीज के बीच की दूरी कम से कम डेढ़ मीटर हो।
-डॉ. आरएस बेदी, आईएमए के पूर्व अध्यक्ष