आखिरकार सभी सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट कराने के लिए सोमवार को पंजाब सरकार ने सभी विभागों को आदेश जारी कर दिए। इसके साथ ही सभी कर्मचारियों से डोप टेस्ट की फीस के 15-15 सौ रुपये देने को भी कहा गया है। यानी डोप टेस्ट का सारा खर्च कर्मचारियों को खुद ही उठाना होगा। इस आदेश के साथ ही विभिन्न कर्मचारी संगठनों की भौंहें तन गई हैं।
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीते दिनों अपने सहित प्रदेश के मंत्रियों-विधायकों का डोप टेस्ट कराने का फैसला लेने के साथ ही सभी पुरुष व महिला सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट कराने का एलान किया था। सरकारी कर्मचारियों के डोप टेस्ट के फैसले का पहले तो कर्मचारियों ने विरोध किया था। मुख्यमंत्री द्वारा यह जब यह एलान किया गया कि पॉजिटिव पाए गए किसी भी कर्मचारी को नौकरी से हटाया नहीं जाएगा बल्कि सरकार उन कर्मचारियों का इलाज कराएगी, तब यह मामला शांत हो गया था। इसके बाद महिला कर्मचारियों का डोप टेस्ट कराने पर विवाद खड़ा हो गया था। अब सोमवार को सरकार की ओर जारी आदेश में कर्मचारियों पर ही डोप टेस्ट का खर्च डाल दिया गया तो कर्मचारी संगठन फिर नाराज हो गए हैं।
पंजाब सिविल सचिवालय कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष सुखचैन सिंह ने कहा कि सरकार का फैसला असहनीय है। पहले कर्मचारियों पर पंजाब डेवलपमेंट फंड के नाम पर प्रति माह 200 रुपये का बोझ डाला गया। अब डोप टेस्ट के नाम पर 1500 रुपये की उगाही होने जा रही है। उन्होंने कहा कि उनका संगठन जल्द ही इस बारे में बैठक कर अगली रणनीति बनाएगा। सरकार को कर्मचारियों पर ऐसे तुगलकी आदेश लादने नहीं दिए जाएंगे। अभी तक कई कर्मचारियों के बकाया डीए और अन्य भुगतान तक सरकार ने नहीं किए हैं।
सीएम और मंत्रियों-विधायकों ने नहीं कराया टेस्ट
सांकेतिक तस्वीर
खास बात यह भी है कि प्रदेश में आम आदमी पार्टी के विधायकों को छोड़ अन्य किसी भी पक्ष या विपक्ष के विधायक ने विभिन्न तरह के कारण बताते हुए अब तक अपना डोप टेस्ट नहीं कराया है। यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी डोप टेस्ट नहीं कराया है।
अकाली दल के नेताओं का कहना है कि वे अमृतधारी सिख हैं और नशे से उनका कभी कोई वास्ता नहीं रहा, इसलिए वे डोप टेस्ट नहीं कराएंगे। कुछ कांग्रेस विधायकों ने यह कहते हुए टेस्ट कराने से इनकार कर दिया है कि अपनी बीमारी के इलाज के लिए कुछ ऐसी दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं, जो डोप टेस्ट में पाजिटिव पाई जा सकती हैं। हालांकि वे कोई नशा नहीं करते।
अस्पतालों में उपलब्ध नहीं डोप टेस्ट किट
राज्य सरकार द्वारा जारी आदेश पर अमल होना आसान दिखाई नहीं दे रहा। पंजाब में सरकारी कर्मचारियों की संख्या 3.87 लाख (2017 के आंकड़ों के अनुसार) है। एक कर्मचारी के डोप टेस्ट का खर्च 1500 रुपये है तो 3.87 लाख कर्मचारियों के लिए कुल 58.05 करोड़ रुपये का खर्च करना होगा। कर्मचारियों को जहां डोप टेस्ट की फीस अखर रही हैं, वहीं सूबे के सरकारी अस्पतालों में लाखों की संख्या में लोगों का डोप टेस्ट करने के लिए उपकरण ही मौजूद नहीं है।
जानकारी के अनुसार, मोहाली के सिविल अस्पताल में हर महीने केवल 15 डोप टेस्ट किट उपलब्ध होती हैं। ऐसी परिस्थितियों में एक महीने के दौरान मोहाली और चंडीगढ़ में कार्यरत पंजाब के हजारों कर्मचारियों का डोप टेस्ट कब पूरा होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। सूबे के बाकी जिलों में भी सिविल अस्पतालों में कमोबेश यही स्थिति है।
डोप टेस्ट से नहीं पता चलता नशे की आदत का
डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति ने कुछ दिन पहले भांग या गांजा पिया हो, परंतु वह इनके नियमित सेवन का आदी न हो तब भी संभव है कि वह डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाया जाए। लेकिन अगर कोई व्यक्ति हेरोइन का नियमित सेवन करता है और उसने तीन-चार दिन से हेरोइन नहीं ली है तो उसका डोप टेस्ट नेगेटिव आएगा।
डाक्टरों के मुताबिक डोप टेस्ट शरीर में नारकोटिक्स की मौजूदगी का पता ही लगा सकता है, यह नहीं बता सकता है कि व्यक्ति नशे का आदी है या नहीं। अगर कोई सामान्य व्यक्ति दो-तीन चम्मच कफ सिरप पीकर ही टेस्ट कराने चला जाए तो वह भी पॉजिटिव पाया जाएगा।