इंसुलिन पर निर्भर दुनिया के करोड़ों शुगर रोगियों के लिए राहत भरी खबर। जल्द ही उन्हें इंजेक्शन के दर्द से निजात मिल सकेगी।
सिर्फ एक ‘मैजिक पिल’ के साथ ही उनकी डायबिटीज कंट्रोल रहेगी। इतना ही नहीं, गोली का असर भी इंजेक्शन से काफी ज्यादा देर तक रहेगा। कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होगा।
जल्द ही आएगा बाजार में
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर), मोहाली के साइंटिस्ट्स ने इंसुलिन पिल का लिपिड बेस्ड फॉर्मुलेशन तैयार किया है।
दिसंबर-13 में ही इसे पेटेंट कराया गया है। अगर सब कुछ सही रहा तो तीन से पांच साल के अंदर चमत्कारी इंसुलिन पिल बाजार में उपलब्ध होगी।
नाइपर के सेंटर फॉर फार्मास्युटिकल नैनो-टेक्नोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संयोग जैन इस रिसर्च टीम के हेड थे। जोकि एक दशक से कई ड्रग्स के नैनो-ड्रग डिलीवरी सिस्टम विकसित करने पर रिसर्च कर रहे हैं।
इंसुलिन पिल: नो साइड इफेक्ट, असर चौबीस घंटे
इंसुलिन प्रोटीन मॉलीक्यूल है जोकि पेट में मौजूद प्रोटियोलिटिक एंजाइम्स द्वारा डाइजेस्ट हो जाता। वहीं, इंसुलिन का इंटेस्टाइनल मेंब्रेन पार करके ब्लड स्ट्रीम में मिलना भी मुश्किल था।
इसलिए ऐसे फॉर्मुलेशन तैयार किए गए, ताकि इंसुलिन को सुरक्षित ब्लड तक पहुंचा सकें। इसके लिए डाइटरी लिपिड्स से नैनो पार्टिकल्स बनाए गए। जिनकी इंसुलिन पर कोटिंग होगी।
खाते ही टैबलेट आंत में पहुंचेगी। जहां एम-सेल्स के जरिए लिम्फ और वहां से ब्लड-स्ट्रीम में मिल जाएगी। इस टैबलेट की एक खासियत यह है कि यह सस्टेन्ड रिलीज है।
लिपिड कोटिंग ऐसी की गई है कि ब्लड स्ट्रीम में जाने के बाद भी इंसुलिन धीरे-धीरे रिलीज होगी, असर देर तक रहेगा। इस टैबलेट का असर 18-24 घंटे तक होगा।
डॉ. जैन ने कहा कि इसमें जो लिपिड्स इस्तेमाल किए गए हैं, वे काफी सस्ते हैं। इस तरह टैबलेट की कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं होगी। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा और एफडीए अप्रूव्ड भी है यह टैबलेट।
उम्मीद के बाद भी हैं कई चुनौतियां
नाइपर की रिसर्च टीम ने हालांकि इंसुलिन पिल तैयार करके उम्मीद की किरण जगाई है, पर इससे हकीकत में बदलने में अभी कई चुनौतियां हैं।
डॉ. संयोग जैन की टीम ने लैब में चूहों पर प्री-क्लीनिकल ट्रायल किए, जो कामयाब रहे। अब क्लीनिकल ट्रायल और उसके बाद क्लीनिकल ट्रायल होंगे। फिर फॉर्मुलेशन की स्केलेबिलिटी देखी जाएगी।
2011 में भी कराया था पेटेंट
डॉ. संयोग जैन की टीम ने सबसे पहले इंसुलिन पिल पर 2009 में रिसर्च शुरू की थी। वर्ष 2011 में रिसर्च पूरी होने के बाद उसका पेटेंट कराया गया। पर, उसमें इंसुलिन पर पॉलीमेरिक नैनो पार्टिकल्स की कोटिंग थी।
पॉलीमेरिक नैनो पार्टिकल्स काफी महंगे हैं। जिसके चलते किसी कंपनी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद अब इस टीम ने लिपिड बेस्ड फॉर्मुलेशन तैयार किए।
ये काफी सस्ते हैं, इसलिए उम्मीद है कि कोई बड़ी कंपनी इस रिसर्च पर दांव लगाए।
कैंसर और फंगल इन्फेक्शन में भी जागीं उम्मीदें
नाइपर की रिसर्च टीम ने इंसुलिन के अलावा दो और अहम दवाओं पर भी रिसर्च की। जोकि अभी तक सिर्फ इंजेक्शन द्वारा ही ली जाती हैं।
इनके टैबलेट फार्म की रिसर्च कामयाब रही। इंसुलिन पिल के साथ दिसंबर-13 में ही इनका भी पेटेंट कराया गया है। डॉ. संयोग जैन ने बताया कि एक एंटी-कैंसर ड्रग डॉक्सरूबीसिन सिर्फ इंजेक्शन-फॉर्म में उपलब्ध है।
इसका सबसे बड़ा साइड इफेक्ट कार्डियो-टॉक्सिसिटी है। इंजेक्शन देने से बार-बार दवा की काफी मात्रा हार्ट में जाती है, जिससे जहर फैलने का खतरा होता है।
इसे भी नैनो पार्टिकल की कोटिंग के साथ टैबलेट फार्म में तैयार किया गया है। यह भी इंसुलिन पिल की तरह निम्फ से होते हुए ब्लड स्ट्रीम में जाएगी।
खास बात यह है कि सस्टेन्ड रिलीज होने के कारण दवा धीरे-धीरे ब्लड में मिलेगी, हार्ट में कम मात्रा में पहुंचेगी। जिससे खतरा बहुत कम हो जाएगा।
कालाजार या लीशमैनियासिस व कुछ खास फंगल इंफेक्शन में दिया जाने वाला इंजेक्शन एम्फोटेरिसिन-बी के भी बहुत साइड इफेक्ट हैं।
इससे नेफ्रो-टॉक्सिसिटी हो जाती है, किडनी में जटिल समस्याएं आती हैं और ब्लड सेल भी डैमेज हो जाती हैं। यह दवा सिर्फ आईवी इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध है।
इसकी भी टैबलेट तैयार करके पेटेंट कराया गया। इस इंजेक्शन को बनाने वाली कंपनी लाइफ केयर इनोवेशंस के साथ आगे की रिसर्च पर बात भी चल रही है।