पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अंतरजातीय एवं अंतरधर्मीय विवाहों से समाज में पैदा हुई गंभीर दूरियां मिटती हैं।
हाईकोर्ट के फैसले का यह अहम तथ्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और सभी राज्यों को दिए गए उस निर्देश का एक हिस्सा है, जिसमें कहा गया था कि सभी धर्मों के विवाहों का जरूरी पंजीकरण सुनिश्चित बनाने के लिए उचित कदम उठाए जाएं।
इसके बाद प्रेम विवाह के पंजीकरण को सरकारी दफ्तरों की ठोकरें खाने के बाद न्याय के लिए हाईकोर्ट पहुंचे एक जोड़े की याचिका पर हाईकोर्ट ने इस तथ्य के साथ अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश समाज को लाभ पहुंचाने के लिए था, क्योंकि मां-बाप की मर्जी के बगैर हुई शादियों के कई गंभीर मामले अदालतों में पहुंचते हैं।
दरअसल एक ऐसे प्रेमी जोड़े ने पंजाब के सरकारी तंत्र के रवैये के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिन्होंने वर्ष 2004 में मां-बाप की मर्जी के बगैर शादी की थी।
यह जोड़ा शादी पंजीकृत कराने के लिए रजिस्टरिंग अथॉरिटी के पास पहुंचा था, लेकिन यह कहते हुए मना कर दिया गया कि मां-बाप की मौजूदगी के बिना पंजीकरण नहीं हो सकता, हालांकि शादी के सुबूत और यहां तक कि बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र आदि भी पेश किए गए।
अब इस याचिका पर जस्टिस रितु बाहरी की बेंच ने कहा है कि शादी पंजीकरण को मनाही के लिए लिए यदि सरकारी तंत्र का मां-बाप की मौजूदगी अनिवार्य होना कारण मान लिया जाए तो इससे सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया लाभ सुरक्षित नहीं रहता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि शादी पंजीकरण के लिए मां-बाप की मौजूदगी जरूरी नहीं है।