सियासी घमासान के बीच किसान आंदोलन का असर एक बार फिर बैकफुट पर रहा। हरियाणा में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह एक बार फिर साबित कर दिया। हरियाणा में भाजपा ने तीसरी बार जनता से बहुमत जुटाकर धरातल पर किसान आंदोलन के खास असर न होने का फैक्टर दिखाया है।
एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर 13 फरवरी से शुरू हुए किसान आंदोलन की धमक शंभू से लेकर खन्नौरी बॉर्डर तक देखने को मिली। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भी पंजाब और हरियाणा में किसान संगठनों और जत्थबंदियों ने अपने आंदोलन को लेकर सत्तारुढ़ दलों और विशेषकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रखा। किसान आंदोलन के बीच लोकसभा चुनाव में पंजाब में भाजपा का वोटिंग प्रतिशत बढ़ने और पड़ोसी राज्य हरियाणा में कुछ महीने बाद ही केंद्रीय नेतृत्व में तीसरी बार बहुमत से सरकार बनाने ने किसान आंदोलन के लिए चुनौती खड़ी कर दी है।
शंभू बॉर्डर पर बीते 9 महीने ने आंदोलन पर बैठे किसान संगठनों व जत्थेबंदियों को अपनी मांगों को मनवाने के लिए अब नया तरीका तलाशना होगा, क्योंकि पंजाब और हरियाणा में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सियासी घमासान के बीच किसान आंदोलन का असर बैकफुट पर साबित हुआ। यहां तक कि हरियाणा के पिहोवा से भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चढूनी को हार का सामना करना पड़ा।
किसानों की आवाज बुलंद करने वाले गुरनाम सिंह चढूनी को हरियाणा विधानसभा चुनाव में केवल 1170 वोट ही मिले। पंजाब से सटे हरियाणा के विधानसभा हलकों में भी किसान आंदोलन का कोई खास असर नहीं देखने को मिला, जबकि चुनाव से ठीक पहले पंजाब व हरियाणा के कई किसान जत्थेबंदियों ने एक साथ केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोला था।