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इन्होंने कहा, थिएटर को आगे लाना है तो प्रयोग जरूरी

Wed, 05 Mar 2014 12:46 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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टीवी सीरियल हो या फिल्में आप कुछ ऐसे कलाकारों को जानते होंगे जो चंडीगढ़ से हैं। लेकिन, शायद यह नहीं जानते होंगे कि वो यही से एक्टिंग के गुर सीख चुके हैं। सुनील ग्रोवर और माही गिल कुछ ऐसे ही नाम हैं जो चंडीगढ़ के इंडियन थिएटर डिपार्टमेंट से अभिनय सीख चुके हैं।
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कई वर्षों से डिपार्टमेंट में थिएटर पढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिर भी शहर में एक ऐसा नाम खोजना मुश्किल है जिसने थिएटर को यहां एक मुकाम पर पहुंचाया हो। प्रसिद्ध रंगकर्मी नीलम मान सिंह और डॉ. नवदीप कौर से चंडीगढ़ में थिएटर से जुड़ी चर्चा में कुछ खास बातें सामने आईं।

इंडियन थिएटर डिपार्टमेंट में पढ़ा रही नीलम मान सिंह ने कहा कि ट्रेनिंग बहुत महत्त्व रखती है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से जब पास आउट हुई तो काफी सीखा, लेकिन असली ट्रेनिंग इसके बाद शुरू हुई।
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आजकल के युवा थिएटर में बहुत जल्दबाजी करते हैं। वह सीखने की विचारधारा को सीमित कर लेते हैं। इसकी वजह उन्हें फिल्मों में काम करना भाता है। थिएटर सिखने में काफी समय लगता है, उसके बाद ही विकास होता है।

एक नाटक में किरदार को अच्छे से निभाना और निर्देशन काफी समय लेता है। इसलिए अपने ग्रुप में 25 वर्ष से एक ही कलाकारों के साथ काम कर रही हूं। चंडीगढ़ में थिएटर को आगे लाना है तो नए प्रयोग करने होंगे, नए नाटक जो दर्शकों की आम जिंदगी से जुड़े हों।

उन्होंने बताया कि दिल्ली में हाल ही में न्याय को लेकर एक नाटक देखा। उसका शीर्षक ‘ओ शिट्ट’ था जो कि एक युवती द्वारा लिखा गया था। चंडीगढ़ में भी इसी तरह के प्रयोग करने होंगे। इससे थिएटर को भी एक नया नाम और मुकाम मिले।

कुछ दिनों पहले केरल गईं, वहां थिएटर के फेस्टिवल में लोगों को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए देखा। वहां थिएटर में कई तरह के प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए लोग भी दिलचस्पी लेते हैं। डिपार्टमेंट में भी कुछ बदलाव होने चाहिए जैसे सिलेबस और आधुनिकीकरण।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए थिएटर डिपार्टमेंट की प्रोफेसर डॉ. नवदीप कौर ने कहा कि कुछ चीजें हैं जिससे एक थिएटरकर्मी को मुश्किल आती है। जैसे कि पैसा, थिएटर करते हुए आगे की जिंदगी के बारे में सोचना मुश्किल हो जाता है। दूसरा ग्रांट और स्पांसर के अभाव में थिएटर पनप नहीं पाता।

डिपार्टमेंट में ज्यादातर बच्चे अन्य राज्यों से आते हैं और पास आउट होने के बाद अपने राज्यों में लौट जाते हैं। इससे चंडीगढ़ में थिएटर के लिए कुछ खास नहीं बचता। थिएटर में जरूरी है नए बदलाव, क्योंकि एक निर्देशक और एक अदाकार को कुछ नया देना होगा तो ही लोग उसे पसंद करेंगे और चंडीगढ़ का भी नाम थिएटर में प्रसिद्ध होगा।

हालांकि डिपार्टमेंट की कोशिश होती है कि बच्चे हमेशा कुछ नया सीखें और नई चीजों को अपने कार्यों में शामिल करें। थिएटर की भलाई के लिए नए नाटकों का लिखा जाना भी जरूरी है।
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