चंडीगढ़ पीजीआई में ब्लड कैंसर (क्रोनिक माइलोजेनस ल्यूकेमिया) के मरीजों में इलाज के लिए दी जाने वाली दवा काम करेगी या नहीं, इसका पता पहले ही चल जाएगा। हेमेटोलॉजी विभाग ल्यूकेमिया लैब में संदिग्ध मरीजों की नेक्स्ट जेनरेशन सिक्वेंसिंग जांच कर इसका पता लगाएगा। क्योंकि अब तक क्रोनिक माइलोजेनस ल्यूकेमिया के लगभग 30 से 40 प्रतिशत मरीजों में जीन में म्यूटेशन के कारण दवा असर नहीं करती। ऐसे में इलाज शुरू करने से पहले इसकी जानकारी न होने पर उन मरीजों पर दवा का कोई असर नहीं होता। उन मरीजों को समय रहते सही इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विभाग के डॉक्टरों ने म्यूटेशन वाले मरीजों में एनजीएस टेस्ट करने का निर्णय लिया है। खास बात यह है कि देश में पहली बार पीजीआई डाइग्नोसिस के समय ही म्यूटेशन की जांच करेगा।
हेमेटोलॉजी विभाग ल्यूकेमिया लैब की प्रभारी डॉ. शानू नसीम ने बताया कि पीजीआई में क्रोनिक माइलोजेनस ल्यूकेमिया के 100 मरीजों पर शोध किया गया है। इसमें से 40 मरीजों में टीकेडी म्यूटेशन पाया गया है। इस म्यूटेशन के कारण ही उन मरीजों पर बीमारी के लिए दी जाने वाली दवा असर नहीं करती। ऐसे में समय रहते इसकी जानकारी हो जाने पर इलाज के मानकों में बदलाव किया जा सकता है। यह शोध जरनल ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है।
सी ए 19-9 टेस्ट एक सेरोलॉजिकल टेस्ट है जो खून में कैंसर एंटीजन 19-9 (CA 19-9) के स्तर को मापता है। इस जांच से ही क्रॉनिक माइलोजेनस ल्यूकेमिया की पुष्टि होती है लेकिन टायरोसिन कीनेस इनहिबिटर (टीकेआई) थेरेपी से प्राप्त प्रभावशाली प्रतिक्रियाओं के बावजूद, क्रोनिक माइलोजेनस ल्यूकेमिया (सीएमएल) के लगभग 40 प्रतिशत मरीजों में उपचार प्रतिरोध विकसित होता है। बीसीआर-एबीएल1 आश्रित तंत्रों में से, टायरोसिन कीनेस डोमेन (टीकेडी) में उत्परिवर्तन प्रतिरोध का सबसे आम कारण है। इसके कारण ही मरीजों पर दवा का असर नहीं होता। अब पीजीआई एनजीएस टेस्ट से इलाज शुरू करने से पहले इसका पता लगाएगा।
पीजीआई में ब्लड कैंसर के मरीजों को बेहतर जीवन प्रदान करने के लिए लगातार शोध कार्य किए जा रहे हैं। इसी क्रम में डाइग्नोसिस में नई कड़ी जोड़कर इलाज को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। -डॉ. पंकज मल्होत्रा, प्रमुख हेमेटोलॉजी मेडिकल ऑन्कोलॉजी, पीजीआई।