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मुरथल मामले में हरियाणा सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

Mon, 28 Mar 2016 09:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
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हरियाणा में पिछले महीने जाट आरक्षण आंदोलन के  दौरान मुरथल में कथित गैंगरेप केस की सुनवाई करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार पर कड़ी टिप्पणी की।
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जस्टिस एसएस सारों एवं जस्टिस गुरमीत राम की डिवीजन बेंच कहा कि बिना एफआईआर कैसी जांच। बेंच ने कहा कि क्या हरियाणा में देश से अलग सीआरपीसी है। दरअसल, सरकारी वकील यही स्पष्ट नहीं कर पाए कि एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई।

प्रदेश सरकार की ओर से गठित एसआईटी के प्रमुख डीआईजी राजश्री ने अदालत में जवाब दाखिल किया कि कोई प्रत्यक्षदर्शी यह कहने को तैयार नहीं है कि गैंगरेप या अश्लील हरकत उसके सामने हुई। एक पीड़िता की शिकायत आई, लेकिन उसने कोई पहचान नहीं दी, ऐसे में दुष्कर्म के आरोप की जांच कैसे की जा सकती है।
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हालांकि, यह जरूर माना कि मुरथल ढाबे पर उपद्रवियों ने गाड़ियों में तोड़फोड़ और लूटपाट की। इसी रिपोर्ट पर एमिकस क्यूरी अनुपम गुप्ता ने सवाल उठाया कि मुरथल में कथित गैंगरेप मामले में संवाददाता भी प्रत्यक्षदर्शियों तक पहुंच गए, लेकिन राज्य सरकार उन तक क्यों नहीं पहुंच पाई। खेतों में महिलाओं के मॉडर्न अंत:वस्त्र बिखरे पड़े मिले, लेकिन पुलिस बयान देती रही कि यह कपड़े पुराने हैं।

एडवोकेट अनुपम गुप्ता ने कहा कि यह राज्य सरकार की विफलता है कि पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभाने में पूरी तरह नाकाम रहे। सरेआम दंगे होते रहे, लेकिन सेना की कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि सरेआम दुष्कर्म होना और ऊपर से सरकार की ओर से इसे नकारना शर्मनाक है।

उन्होंने यह भी बताया कि पटपड़गंज दिल्ली निवासी बॉबी जोशी प्रत्यक्षदर्शी है, लेकिन पुलिस ने उससे जानकारी नहीं जुटाई। इस पर बेंच ने सरकारी वकील से पूछा कि जब सूचना थी तो दुष्कर्म मामले में एफआईआर क्यों नहीं की। बेंच ने यह भी पूछा कि विशेष जांच टीम का काम सबूत जुटाना है, लेकिन यहां टीम सूचना जुटाती रही।
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
बेंच ने कहा कि सीआरपीसी में और सुप्रीम कोर्ट की ओर से ललिता कुमारी केस में दिए फैसले में साफ तौर पर प्रावधान है कि पहले एफआईआर दर्ज हो और बाद में जांच, लेकिन मुरथल मामले में कानून की कोई परवाह नहीं की गई। पुलिस जिमनियां और केस डायरी तक पेश नहीं कर सकी है।

उधर, इस मामले में सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है, लिहाजा एमिकस क्यूरी की ओर से मुरथल घटना की जांच सीबीआई को देने केसुझाव पर ध्यान देना जरूरी है। बेंच ने चार अप्रैल को इस विषय पर बहस जारी रखने का निर्णय लिया है कि मामला क्यों न सीबीआई के हवाले किया जाए।

जज तक सुरक्षित नहीं
भिवानी की सीजेएम स्वाति सहगल ने हरियाणा स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी के मेंबर सेक्रेटरी सेशन जज पंचकूला को पत्र लिखा है कि 20 से 29 फरवरी तक भिवानी कोर्ट कांप्लेक्स में पूरी फोर्स निहत्थी थी और इसकी जानकारी वहां के सेशन जज तक को नहीं दी गई। जाट आंदोलन के दौरान उपायुक्त का परिवार वहां के एसपी के घर रहा और बड़ी संख्या में पुलिस बल एसपी की रिहायश पर उनकी सुरक्षा में लगा रहा, लेकिन न्यायिक अधिकारियों की किसी ने कोई परवाह नहीं की।

बेंच ने इस व्याख्यान को अपने अंतरिम आदेश का हिस्सा बनाया है। सीजेएम सहगल के अलावा चरखी दादरी के सिविल जज अनिल कुमार यादव ने सीजेएम भिवानी को पत्र लिखकर अवगत कराया कि उन्होंने भिवानी के एसएसपी से चरखी दादरी में अफसरों की सुरक्षा के लिए फोर्स मांगी, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि 21 से 29 फरवरी तक वह और उनका परिवार स्वयं दहशत में रहे।

तोशाम के एडिशनल सिविल जज सुनील कुमार दीवान ने सीजेएम भिवानी को पत्र लिख कर कहा कि तोशाम में दर्ज दो एफआईआर के संबंध में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। पुलिस व प्रशासन के खिलाफ जुबानी शिकायतें आती रहीं, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के कारण कोई लिखित शिकायत को तैयार नहीं। पुलिस और प्रशासनिक अमला लोगों में उनकी सुरक्षा का भरोसा पैदा करने में विफल रहा।

सरकार से मिला हुआ है एजी ऑफिस
बेंच ने सरकार की रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज किए बिना जांच करने पर मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी वकील के पास कोर्ट के सवालों का कोई जवाब नहीं है। कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, न ही एसआईटी बनाने के पीछे कानूनी तर्क है और न ही बिना एफआईआर जांच करने पर। बेंच ने कहा कि एजी कार्यालय और सरकार मिली हुई है।
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