विकास की अंधी दौड़ में सभी लोग चल रहे हैं जो पर्यावरण के लिए खतरा है। पानी की कमी का भी यह बड़ा कारण है, लगातार दोहन हो रहा है। इसके लिए सभी को अभी से चेतना चाहिए। पानी का दोहन कम करें और प्रकृति से अधिक से अधिक प्रेम करें। यह बात शनिवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पीयू में आयोजित व्याख्यान माला- 2019 के दौरान कही।
यह कार्यक्रम पंचनद शोध संस्थान और पीयू के पर्यावरण विभाग की ओर आयोजित किया गया था। इसमें पर्यावरण एवं जल की वैश्विक समस्या व समाधान विषय पर बात की गई। डॉ. जोशी ने कहा, सतत विकास की ओर अधिक न झुकें, सतत संरक्षण की ओर जाएं। प्रकृति को इग्नोर नहीं किया जाना चाहिए। सभी को प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करते हुए कार्य करने की जरूरत है।
यह नहीं सोचें कि प्रकृति कुछ नहीं करेगी, लेकिन अति हर चीज की खराब होती है। उन्होंने गंगा नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि इसमें आर्सेनिक की मात्रा मिल रही है। साथ ही सुंदरवन में समुद्र का पानी आ गया है, इसके कारण वह पीने योग्य नहीं है। उन्होंने दुनियाभर के पानी के आंकड़ों को सामने रखा। साथ ही दुनियाभर में किए जा रहे जल संरक्षण के बारे में बताया।
पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस डॉ. भारत भूषण प्रसून ने अध्यक्षता करते हुए विषय पर प्रकाश डाला। पीयू वीसी प्रो. राजकुमार ने भी पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया। इस मौके पर पंचनद संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. केएस आर्य, प्रो. वीके कुठियाला, पीयू पर्यावरण अध्ययन विभाग की अध्यक्ष डॉ. सुमन मोर मौजूद रहीं।