सौ साल पुराने जगाधरी के बर्तन उद्योग की ख्याति पूरे देश में है। इसी ने शहर को बर्तन नगरी की पहचान दी है। यहां बर्तन बनाने का ज्यादातर काम माइक्रो, स्माल और मीडियम इकाइयों में ही हो रहा है। आज जगाधरी व आसपास क्षेत्र में बर्तन बनाने की छोटी-बड़ी करीब एक हजार इकाइयां हें। इनका सालाना टर्न ओवर एक हजार करोड़ रुपये से अधिक है। यहां स्टील के अलावा, एल्यूमिनियम, कांसे, तांबे व पीतल के बर्तन भी बनते हैं।
बर्तन निर्माण के उद्योग में करीब पांच हजार परिवार जुड़े हैं। इन फैक्ट्रियों में 60 हजार से अधिक श्रमिक काम करते हैं। शहर में 500 से अधिक ट्रेडर्स भी हैं। कुल मिलाकरजगाधरी शहर में करीब 80 प्रतिशत लोग बर्तन उद्योग से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
आजादी से पहले बुड़िया रियासत के राजा अमोल सिंह के पिता ने बूड़िया से कुछ किलोमीटर दूरी पर जगाधरी शहर बसाया था ताकि बाहर के लोग यहां आकर कारोबार कर सके। पहले यहां लोहे का काम होता है। इसके बाद पीतल और कांसे के बर्तन बनने लगे। समय के साथ बर्तन बनाने वालों की संख्या भी बढती चली गई।
देश के विभाजन के दौरान बड़ी संख्या से पाकिस्तान से आए लोग यहां आकर बस गए। वे भी बर्तन बनाने के धंधे से जुड़े गए। तब बर्तन हाथ से बनाए जाते थे और बर्तन बनाने वालों को ठठियार कहा जाता था। आज भी कुछ ठठियार हाथों से ही बर्तन बनाते हैं। वैसे ज्यादातर काम अब लेथ मशीनों से होता है।
मेटल पिघलाने के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है और इसकी दरें बढ़ती रहने से लागत भी लगातार बढ़ रही है और उद्योग अन्य राज्यों से प्रतियोगिता में पिछड़ रहा है। जगाधरी के बर्तन उद्योग को इंडस्ट्री फीडर से बिजली की सप्लाई नहीं मिल पा रही है। उद्योगों को डोमेस्टिक फीडर से बिजली दी जाती है। कई बार बिजली चली जाने पर बर्तन उत्पादन प्रभावित होता है।
जगाधरी के बर्तन उद्योग को जोधपुर व अहमदाबाद के बर्तनों से चुनौती मिल रही है। बर्तन निर्माताओं के अनुसार राजस्थान में वैट एक प्रतिशत व सीएसटी एक प्रतिशत है। वहीं गुजरात में वैट पांच प्रतिशत व सीएसटी जीरो है। जबकि हरियाणा में वैट 5.25 प्रतिशत व सीएसटी दो प्रतिशत है। इस कारण जोधपर व अहमदाबाद के बर्तन जगाधरी के बर्तन से सस्ते पड़ते हैं।
जगाधरी में अब तक कॉमन इफ्यूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग पाया है। हर फैक्टरी में ईटीपी लगाना काफी खर्चीला है। जगाधरी में तैयार बर्तनों को दूसरे राज्यों में रेल द्वारा डायरेक्टर भेजने की व्यवस्था नहीं है। जगाधरी रेलवे स्टेशन पर बर्तनों की बुकिंग के बाद इन्हें सहारनपुर ले जाया जाता है, जहां से एजेंट के माध्यम से दूसरे राज्यों में बर्तन भेजे जाते हैं।
पिछली सरकारों ने यहां बर्तन क्लस्टर बनाने और सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा किया था मगर इस पर कभी अमल नहीं हुआ। बर्तन इंडस्ट्री लंबे समय से जगाधरी में एक टूल रूम एंड ट्रेनिंग सेंटर की मांग करती आ रही है। मगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया। अगर यह बनता है तो उद्योग को दक्ष कारीगर मिलेंगे और क्वालिटी में सुधार आएगा। जगाधरी में आज भी बर्तन पुरानी लेथ मशीनों पर बन रहे हैं।
इस उद्योग के आधुनिकीकरण में सरकार को जरूरी सहयोग करना चाहिए। पिछले दस साल में यह बदलाव आया है कि अब पीतल की जगह एल्यूमिनियम के बर्तन ज्यादा बनते हैं। बर्तनों की जगह पीतल व तांबे की शीट का निर्माण करने वाली इकाइयां लगी हैं। पहले ये शीट मुंबई और दिल्ली से मंगवाई जाती थीं। अब यहां से पूरे देश में ये सप्लाई की जाती हैं। इन शीट से बर्तन, बिजली व सेनेटरी आदि का सामान बनाया जाता है।
जगाधरी में 50 से अधिक शीट बनाने वाली फैक्ट्रियां हैं, जिनका सालाना टर्नओवर 200 करोड़ से अधिक है। जगाधरी के बर्तनों का निर्यात भी किया जाता है। यहां करीब एक दर्जन एक्सपोर्टर्स हैं, जिनका सालाना टर्न ओवर करीब 200 करोड़ है। यहां बने बर्तन अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अफ्रीकी व अरब देशों के अलावा थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि देशों में भेजे जाते हैं।
बंदरगाह से दूर होने के कारण यहां के निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। अहमदाबाद व मुंबई में भी बर्तन बनते हैं। ये शहर बंदरगाह से नजदीक होने के कारण उनका ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बचता है। कुछ साल पहले तक यहां के निर्यातकों को दो प्रतिशत सब्सिडी दी जाती थी, जिसे बंद कर दिया गया है। इससे जगाधरी से 25 प्रतिशत बर्तनों का निर्यात घट गया है।
जगाधरी के बर्तन उद्योग के विस्तार के लिए मानकपुर में इंडस्ट्रियल एरिया फेज वन बनाया गया है, लेकिन यह बर्तन निर्माताओं के लिए सफेद हाथी बना हुआ है। यहां जमीन की कीमत इतनी अधिक है कि बड़ा उद्योगपति यहां इंडस्ट्री लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। यहां चार हजार स्कवायर यार्ड जमीन की कीमत करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये है। एएचएसआइडीसी प्लाट धारकों से मैनटेनेंस चार्ज लेती है।
नगर निगम यहां हाउस टैक्स भी ले रहा है। मानकपुर इंडस्ट्रियल एरिया फेज वन में प्लाट तो आवंटित कर दिए गए, लेकिन पर्याप्त सुविधाएं नहीं दी जा रही है। इंडिस्ट्रयल एरिया में लैंड लाइन फोन लगवाने तक की सुविधा नहीं है। यहां अब तक कॉमन इफ्यूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया गया है।