रेवाड़ी का पीतल उद्योग दो सौ साल पुराना है। पीतल के बर्तन यहां से पूरे देश में सप्लाई होते हैं। इसीलिए इसका नाम पीतल नगरी पड़ा। शुगर मिलें और देश की 80 फीसदी फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री रेवाड़ी में बनी जालियों का इस्तेमाल करती हैं।
यहां की पीतल का इस्तेमाल पांच और दस रुपये के सिक्के बनाने, मेट्रो ट्रेन बनाने, सेना के कारतूस बनाने में इस्तेमाल होता है। यह वजह है कि किसी समय मेटल शीट एक्सपोर्ट बेस मुंबई से शिफ्ट होकर रेवाड़ी आ गया। विदेशों में जो मेटल सीट एक्सपोर्ट होता है उसमें रेवाड़ी का योगदान 70 फीसदी है।
यह पूरी इंडस्ट्री बड़े पैमाने पर यहां के गली कूचों में ही चल रही है। पीतल से यह चमकदार गाथा यहां की माइक्रो, स्माल और मीडियम इकाइयां ही लंबे समय से लिखती आ रही हैं। रेवाड़ी का मेटल सर्वोत्तम क्वालिटी का होने के कारण इसकी देश-विदेश में खूब मांग है। सालाना एक हजार करोड़ रुपये का कारोबार है।
माना जाता है कि सन् 1810 में रेवाड़ी के गली कूचों में पीतल बर्तन बनाने का काम शुरू हुआ था। छोटे से स्तर पर शुरू हुए इस उद्योग में अधिकतर बर्तन बनाने का काम किया जाता है। तब से लेकर 1990 तक उद्योग में हाथ से बर्तन आदि बनाने का ही काम होता रहा। दो साल पुराना पीतल उद्योग अब अपनी चमक खो रहा है।
आम घरों में पीतल के बर्तनों की जगह लगातार कम होते जाने और सरकार द्वारा सहूलियतें छीन लेने से दिक्कतें और बढ़ी हैं। 1988 में हुड्डा ने मेटल उद्योग के लिए दिल्ली रोड पर सेक्टर-11ए विकसति किया था। यहां अस्सी से ज्यादा प्लाट हैं। मगर विभागीय अड़चनों और लालफीताशाही की वजह से यहां 27 साल में सिर्फ चार इकाइयां ही लगी हैं। मेटल इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, पूणे व गुजरात से आता है।
तैयार माल देश के कई हिस्सों और कई देशों में जाता है। माल लाने और ले जाने पर अब भारी भरकम भाड़ा चुकाना पड़ता है। पहले सरकार फ्रेट सब्सिडी देती थी मगर कई साल से यह बंद कर दी गई। समुद्र के नजदीक जो उद्योग चला रहे हैं, उनकी तुलना में रेवाड़ी के उद्योग की लागत ज्यादा होने से यह उद्योग पिछड़ने लगा है।
आसियान फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होने से थाइलैंड अपना माल खपा रहा है और रेवाड़ी के पीतल उद्योग को कड़ी टक्कर दे रहा है। यदि सभी देशों के साथ ऐसा एग्रीमेंट हो गया तो यहां का उद्योग बंद होने की कगार पर आ जाएगा।
डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा के माल पर एक्साइज ड्यूटी लगा दी जाती है, जो परचेज पर पांच फीसदी और सेल पर तीन फीसदी है। यह अंतर भी इस उद्योग को भारी पड़ रहा है। लेबर की दिक्कत बनी रहती है। इस समस्या को खत्म करने के लिए ऑटोमेशन की सस्ती तकनीक और प्रशिक्षण का अभाव है।