राहत इंदौरी साहब ऐसे शायर थे कि समाज की एक पीढ़ी उनसे प्रभावित थी। उन्होंने अपनी विद्वता के दम पर मुशायरे को साहित्यिक रंग दे दिया था। अधिकांश तौर पर शायर मुशायरे में श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए सतही शायरी करते नजर आते हैं लेकिन राहत साहब मुशायरों में अपना वही कलाम पेश करते थे, जो साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने को भेजते थे। मुझे उनके साथ वर्ष 2012 में लखनऊ में एक मुशायरा पढ़ने का मौका मिला था। उनके फक्कड़पन से कोई भी उनकी जहानत का अंदाजा नहीं लगा सकता। वे बहुत पढ़े-लिखे शायर थे। - महेंद्र सानी, शायर
उनकी शायरी के कायल थे हम
राहत साहब के जाने का बहुत दुख है। उनकी शायरी के चंडीगढ़ के लोग कायल थे, इस कारण से अभी तक कलामंच की ओर से तीन बार मुशायरा कराया गया, जिसमें उन्होंने भी हिस्सा लिया था। वह बेहद ही सरल और मजाकिया थे। चंडीगढ़ में जब भी वह मुशायरे के लिए आए, उनको हमेशा मैं ही एयरपोर्ट से लेने जाता था। इस दौरान वह कई अपनी कल्मों को पढ़ते थे, जिसमें वह यह बताते थे कि समाज सभी का है, इसमें किसी भी जाति या धर्म को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए। - वसीम मीर, सदस्य, इबारत लेखक कलामंच
गंगा-जमुना तहजीब के शायर थे
राहत इंदौरी साहब गंगा-जमुना तहजीब के शायर थे। देश में भाईचारा बनाए रखने को लेकर कई नज्में पेश की। फिल्मी दुनिया में उनकी लेखनी का डंका बजता था, जो भी गाने उन्होंने लिखे उनको देश के लोगों ने खूब पसंद किया। कई बार उनके साथ मुझे मुशायरा पढ़ने का मौका मिला। वह बहुत ही तहजीब और प्यार से मिला करते थे, ऐसा लगता ही नहीं था कि वह इतने बड़े शायर होंगे। रूखसत जमाने से एक दिन सब हो जाएंगे, जानते हैं सब मगर, पता नहीं कब हो जाएंगे। - अल्लाह रखा, शायर