इसमें राजस्थान से आई ममता कालड़ा ने घर में माई भूखी है भोज करे संसार, कागज की नैया तले कैसे उतरे पार, घर जमीन सब छोड़ के चल दिए देश पराया। धान देश में ना रहे पैसा लियो चबाय... पेश कर वाहवाही लूटी।
प्रेम नगरी आगरा से आए कवि नारायण भदौरिया नवल ने जरूरी तो नहीं फिर आएंगे ईश्वर विमानों में, वो सबका पेट भरने को समाए हैं किसानों में..., मध्य प्रदेश से आए जितेंद्र जीत चंबल ने कितने अपने बिछड़े हमसे कितनों ने ठुकराया है..., दिल्ली से आए कवि अविनाश गोमूर्ति ने युगों-युगों तक महाभारत मानव को यही सिखाएगा, कोई चाहे ना चाहे पर कर्म लौटकर आएगा... पेश कर वाहवाही लूटी।
पवन मुसाफिर ने है मुझको देह पर संदेह कोई भाव दे दो तुम, ये सागर मोह का लंघ जाए ऐसी नाव दे दो तुम..., चंडीगढ़ की कवयित्री डॉ. अन्नु रानी शर्मा ने थक के रजनी भी दिवस को राह दे देगी सखे, तू सुबह तक दीप्त रहना एक तारे की तरह.., जींद-हरियाणा के शायर शमशेर साहिल ने ये शब में काम आते हैं सवेरे काम आते हैं, कभी जब दिल दुखे बाहों के घेरे काम आते हैं..., हिमाचल प्रदेश से आए महेश्वर सिंह ने जब किसी की कमान में था मैं, तो खुद अपनी ही आज में था मैं..., जीरकपुर के हरि किशोर गोस्वामी ने कल कल करती नदियों के स्वर मिलकर कहते भारत एक, वृद्ध तपस्वी हिमालय का चिंतन कहता भारत एक..., चंडीगढ़ के शायर करन सहर ने कुछ ऐसा पाक अंधेरा हुआ है, दिया बुझकर भी रोशनी लग रहा है... पेश कर तालियां बटोरीं।