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अंग प्रत्यारोपण के लिए सास भी निकट संबंधी, रिश्तों को कानून की संकीर्ण परिभाषा में मत बांधो : हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अंग प्रत्यारोपण पर बहुत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया कि सास को भी किडनी ट्रांसप्लांट के लिए निकट संबंधी माना जा सकता है। अदालत ने साफ कहा कि रिश्तों को सिर्फ कानून की किताबों में सीमित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने अब सास को निकट संबंधी मानने का रास्ता साफ करते हुए डोनर स्वैप को मंजूरी दे दी है और पीजीआई चंडीगढ़ को ट्रांसप्लांट प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
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एडवोकेट मौली ए लखनपाल ने याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट को बताया कि दो मरीज अनिल कुमार और हरजीत सिंह किडनी फेल होने के कारण डायलिसिस पर निर्भर थे और वे दोनों एक दूसरे से अंजान थे। एक तरफ अनिल कुमार की सास अपनी किडनी देने को तैयार थी दूसरी तरफ हरजीत सिंह की पत्नी भी पति की जान बचाने को तैयार थी लेकिन ब्लड ग्रुप और अन्य कारणों से दोनों अपने-अपने डोनर से किडनी नहीं ले सकते थे। ऐसे में दोनों परिवारों ने डोनर स्वैप का रास्ता अपनाने की कोशिश की जिसमें एक डोनर दूसरे मरीज को किडनी देता है और बदले में दूसरा डोनर पहले मरीज को लेकिन प्राधिकरण समिति ने यह कहते हुए अनुमति देने से इन्कार कर दिया कि सास कानून में निकट संबंधी की परिभाषा में शामिल नहीं है।
जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने इस तकनीकी अड़चन को खारिज करते हुए कहा कि कानून का मकसद जिंदगी बचाना है, रोकना नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांसप्लांट कानून का मकसद गरीबों के अंगों के शोषण को रोकना है न कि स्वैच्छिक और ईमानदार दान को बाधित करना। हाईकोर्ट ने माना कि आज के समय में परिवार छोटे हो गए हैं और अक्सर एक-दो बच्चे ही होते हैं। ऐसे में रिश्तों की सूची सीमित हो गई है इसलिए व्याख्या को व्यावहारिक बनाना जरूरी है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि सास को निकट संबंधी की श्रेणी से बाहर रखना वास्तविकता से आंख मूंदने जैसा है। हाईकोर्ट ने बड़ा सवाल उठाया कि अगर कानून की सख्त व्याख्या लागू की जाए तो जिन लोगों के पास परिभाषित रिश्तेदार नहीं हैं उनका क्या होगा? क्या वे कभी ट्रांसप्लांट नहीं करा पाएंगे? हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति कानून के उद्देश्य के खिलाफ है।
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