अधिकारी ने बताया कि जगुआर के लिए वायुसेना की ओर से डारिन-111 तकनीकी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसके तहत इनकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एवियोनिक्स, नेविगेशन सिस्टम और हथियार प्रणालियों को पहले से अधिक सुधारा जा रहा है।
मोरनी की पहाड़ियों के बीच भारतीय वायुसेना के लड़ाकू जहाज जगुआर के क्रैश होने के मामले में एयरफोर्स के दिल्ली मुख्यालय की ओर से जांच के लिए चार अधिकारियों की कोर्ट कमेटी गठित कर दी गई है। कोर्ट कमेटी के सदस्यों ने शनिवार को घटनास्थल पर पहुंचकर हादसे को लेकर जांच की। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि जगुआर के एडोर एमके-811 इंजन में खराबी आने के कारण यह हादसा हुआ है। एयरफोर्स के एक आलाधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है।
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जगुआर के सारे क्षतिग्रस्त पुर्जों को अंबाला एयरफोर्स स्टेशन ले जाया जा रहा है। शुक्रवार को अंबाला छावनी एयरफोर्स स्टेशन से उड़ा जगुआर पंचकूला जिले के मोरनी की पहाड़ियों के बीच क्रैश हो गया था। उस दौरान विमान को पायल नवीन रेड्डी उड़ा रहे थे। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जब विमान हवा में था तो इसके इंजन ने काम करना बंद कर दिया था। पायलट ने पता लगते ही तुरंत इस बारे में अंबाला एयरफोर्स स्टेशन को सूचना भी दे दी थी। हवा में इंजन बंद होते ही जब विमान कंट्राेल नहीं हो सका तो पायलट पैराशूट लेकर कूद गया था, जिससे उसकी जान बाल-बाल बच गई थी और विमान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था।
विमान के एक-एक हिस्से की प्रमुखता से की जा रही है जांच
एयरफोर्स मुख्यालय के एक अधिकारी ने अमर उजाला से हुई विशेष बातचीत में बताया कि हादसे की जांच के लिए कोर्ट कमेटी गठित कर दी है, जिसने जांच भी शुरू कर दी है। पायलट से भी पूछताछ जारी है। विमान के एक-एक हिस्से सहित इंजन की प्रमुखता से जांच की जा रही है। हालांकि यह बात सामने आई है कि जगुआर में पुराने एयरफ्रेम और कम पावर वाले एडोर एमके-811 इंजन के कारण यह हादसा हुआ है। इस खराबी की जांच की जा रही है। इससे पहले भी एमके-811 इंजन वाले जगुआर कई बार तकनीकी खराबी के कारण हादसे का शिकार हो चुके हैं।
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हथियार प्रणालियों को पहले से अधिक सुधारा जा रहा
अधिकारी ने बताया कि जगुआर के लिए वायुसेना की ओर से डारिन-111 तकनीकी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसके तहत इनकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एवियोनिक्स, नेविगेशन सिस्टम और हथियार प्रणालियों को पहले से अधिक सुधारा जा रहा है। 1970 में देश के सबसे पुरानी अंबाला छावनी एयरफोर्स स्टेशन से ही जगुआर ने पहली उड़ान भरी थी। जगुआर को पहले बुल्स कहा जाता था, लेकिन अब वायुसेना में जगुआर की संख्या नाममात्र ही रह गई है। ये विमान अब केवल प्रशिक्षण के लिए उपयोग किए जाते हैं।