मोदी सरकार के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र की दो बड़ी घोषणाएं किसी क्रांति से कम नहीं हैं। हालांकि इस बार बजट के लिए जो राशि आवंटित की गई है, वह पिछले बजट के मुकाबले कम है। पिछली बार बजट में करीब 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी जबकि इस बार यह आंकड़ा 11.5 प्रतिशत ही है। इससे जीडीपी के 2.5 फीसदी के लक्ष्य को पाना मुश्किल होगा।
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पहली योजना नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम है जबकि दूसरी हेल्थ वेलनेस सेंटर। पहली योजना गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जबकि दूसरी योजना स्वास्थ्य क्षेत्र में आ रहे बदलाव को लेकर है। जिस तरह से क्रोनिक बीमारियां (टीबी, डायबिटीज, कैंसर, हाइपरटेंशन) बढ़ रहीं हैं, उसको ध्यान में रखकर हेल्थ वेलनेस सेंटर बनाए जाएंगे। इसके लिए 1200 करोड़ रुपये आवंटित करने का एलान किया गया है। नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम में विभिन्न हेल्थ इंस्टीट्यूट लिए गए सुझावों में पीजीआई से स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एडिशनल प्रोफेसर डा. शंकर प्रिंजा के भी सुझाव शामिल हैं।
क्या है नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम
इस योजना के तहत गरीब परिवारों के इलाज के लिए प्रति वर्ष पांच लाख रुपये देने का एलान किया गया है जबकि पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत एक गरीब परिवार को 30 हजार रुपये प्रति वर्ष दिए जाते थे। इस हिसाब से यह काफी बड़ा कदम है। पहले जिला अस्पताल के स्तर पर दी जाने वाली सुविधाएं बीमा योजना में शामिल थीं। मगर नई स्कीम के तहत टर्शरी लेवल यानी हार्ट, लिवर, किडनी, सांस सहित सभी क्रोनिक बीमारियों को इसमें शामिल किया जाएगा। जैसा कि बजट में एलान किया गया है कि दस करोड़ परिवारों को इसका लाभ मिलेगा। इस हिसाब से पहले चरण में बीपीएल परिवारों को शामिल किया जाएगा।
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क्यों लाई गई यह स्कीम
Modi Care largest National health protection scheme
- फोटो : File Photo
क्यों लाई गई यह स्कीम
दरअसल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत सिर्फ 30 हजार रुपये की सीमा थी। इस स्कीम के दायरे में आने के बावजूद परिवारों को अपनी जेब से बहुत ज्यादा खर्च करना पड़ता था। समय-समय पर इस स्कीम के मूल्यांकन पर पता चला कि गरीब व्यक्तियों को स्वास्थ्य लाभ तो मिला लेकिन लोगों का अपना खर्च भी ज्यादा बढ़ गया इसलिए इस स्कीम के दायरे को बढ़ाने की जरूरत समझी गई।
इससे क्या फायदा होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि एक तो गरीब परिवारों को इलाज में फायदा मिलेगा। दूसरा कई राज्य इस तरह की स्कीम पहले से ही चला रहे हैं, जिसमें राज्यों का पैसा बहुत ज्यादा खर्च हो रहा है। हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में टर्शरी केयर की सुविधाएं बीमा योजना के तहत दी जा रही हैं अब यदि सेंटर से इस स्कीम के तहत रुपया मिलता है तो राज्यों का पैसा बचेगा और इस पैसे का दूसरी योजनाओं या हेल्थ के इन्फ्रास्ट्रक्चर को और डेवलप करने पर खर्च किया जाएगा।
इस बात का रखना होगा ध्यान
विशेषज्ञ मानते हैं कि नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम बहुत अच्छी है मगर इसे किस तरह से लागू किया जाता है और कैसे इसकी निगरानी की जाती है, यह देखने वाली बात होगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना से मिलने वाली राशि के दुरुपयोग देखे जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में बीमा योजना का लाभ उठाने के लिए कई युवतियों की बच्चेदानी निकाले जाने जैसी शिकायतें भी सामने आ चुकी हैं। यह भी देखा गया है कि अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनी की सांठगांठ से आर्मी और अन्य संगठनों के रुपयों को गबन किया जा चुका है। ऐसे में इस स्कीम को सफल बनाने में उच्च स्तर की निगरानी जरूरी होगी।
स्वास्थ्य उपकेंद्रों को स्वास्थ्य वेलनेस केंद्र में बदलने की योजना
pgi chandigarh
- फोटो : अमर उजाला
स्वास्थ्य उपकेंद्रों को स्वास्थ्य वेलनेस केंद्र में बदलने की योजना
बजट में एलान की गई यह योजना एक क्रांतिकारी कदम है। इसके तहत स्वास्थ्य उपकेंद्रों को स्वास्थ्य वेलनेस केंद्र में बदले जाने की योजना है। इसके तहत 1200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। बीमारियों में आ रहे परिवर्तन को ध्यान में रखकर योजना तैयार की गई है।
आजादी के बाद से स्वास्थ्य प्रणाली का मुख्य उद्देश्य जच्चा-बच्चा की देखभाल रहा है। एक दशक पहले तक शिशु और मां का मृत्युदर काफी अधिक था। इंफेक्शन से होने वाली बीमारियां निमोनिया, डायरिया, कालरा की दर अधिक थी, मगर अब इनकी रफ्तार थमी है। तमाम वैक्सीनेशन से इंफेक्शन वाली बीमारियों में कमी आई है जबकि क्रोनिक बीमारियां (हाइपरटेंशन, डायबिटीज, किडनी आदि) भी बढ़ी हैं।
वेलनेस स्कीम के तहत प्राथमिक सब सेंटर को अब अपग्रेड किया जाएगा। प्राथमिक सब सेंटर में अभी सिर्फ एक एएनएम और मेल वर्कर होता है, जिसका काम गर्भवती महिलाओं की जांच, टीकाकरण और फैमिली प्लानिंग की योजनाओं का प्रचार प्रसार होता है। मगर अब इसमें एक नर्स और हेल्थ प्रोफेशनल रखे जाएंगे। सरकार के मुताबिक इस सेंटर के लिए विशेष कोर्स तैयार किया जाएगा, जो एक साल का होगा। इसमें हेल्थ वर्कर को ट्रेंड किया जाएगा जो डायबिटीज या हाइपरटेंशन की दवाओं देने में माहिर होंगे। इसमें जांच सुविधा का भी प्रावधान रखा गया है। इसमें ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और अन्य जांच सुविधाएं होंगी। यह वेलनेस सेंटर हर पांच हजार की आबादी पर होगा।
पिछली बार से कम बजट बढ़ा
इस बार स्वास्थ्य क्षेत्र का ओवरऑल बजट काफी कम आवंटित हुआ है। हेल्थ पर कुल बजट 52800 करोड़ रुपये तय किया गया है जो करीब 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। साल 2016-2017 में 37061 करोड़, साल 2017-2018 में 47353 करोड़ और साल 2018-2019 में 52800 करोड़ रुपये आवंटित किया गया है। पिछली बार 25 प्रतिशत से ज्यादा बजट का एलान हुआ था।
दोनों ही योजनाएं हेल्थ सेक्टर में भारी बदलाव लाने वाली हैं। हालांकि यह बात देखने वाली होगी कि इन्हें किस तरह लागू किया जाता है। इन योजनाओं को सफल बनाने के लिए उच्च स्तर की निगरानी जरूरी है। दूसरा इस बार उम्मीद के मुताबिक कम बजट आवंटित किया गया है। हेल्थ सेक्टर में मात्र 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी से जीडीपी के 2.5 फीसदी के लक्ष्य को पाना मुश्किल होगा। - डा. शंकर प्रिंजा, एडिशनल प्रोफेसर, स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ चंडीगढ़