पीजीआई की फार्मेसी दवाएं तो खरीद लेती हैं, लेकिन उनमें अधिकतर दवाएं मरीजों के काम नहीं आती। साल 2009 से लेकर 2016 तक करीब एक लाख 64 हजार की दवाइयां रद्दी की टोकरी में फेंक दी गई, क्योंकि वे एक्सपायर हो गई थीं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की आडिट टीम ने उन पर आपत्ति जताई है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2009-2012 में 5252 रुपये, साल 2012-13 में 49214 रुपये, साल 2013-14 में 56185 रुपये, साल 2015में 52929 रुपये की दवाएं एक्सपायर हो गई।
इससे सरकार को करीब 1.64 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि भविष्य में खरीदारी करते वक्त इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि दवाओं का समय रहते इस्तेमाल हो सके।
सर्विस बुक में गड़बड़ी
पीजीआई की सर्विस बुक में कई गड़बड़ियां मिली हैं। अडिटर ने अपनी जांच में पाया है कि सर्विस बुक में कई नामिनेशन गायब है। जरूरी कॉलम जैसे कि जन्मतिथि, कर्मचारी का होम टाउन जैसे कॉलम भरे नहीं गए। वे खाली पड़े हैं। कई केस में छुट्टियां अपडेट नहीं की गई है। इतने सालों में किसी को डुप्लीकेट सर्विस बुक इश्यू नहीं की गई।
वेरिफिकेशन के लिए हर साल होने वाले कर्मचारियों के हस्ताक्षर भी नहीं मिले हैं। उन अधिकारियों के हस्ताक्षर भी नहीं है, जो सर्विस बुक को वेरिफाई व अटेस्टेड करते हैं। एडहाक इंप्लाइज के छुट्टियों के रिकार्ड भी मेनटेन नहीं किए गए हैं। आडिटर ने सिफारिश की है कि सभी कर्मचारियों की सर्विस बुक को अच्छी तरह से मेनटेन किया जाए।
छुट्टियां और नामिनेशन को अपडेट किया जाए। हर कर्मचारियों को डुप्लीकेट सर्विस बुक भी इश्यू करनी चाहिए। हर साल वेरिफिकेशन के बाद कर्मचारियों के हस्ताक्षर जरूर करवाए जाएं। जिन कर्मचारियों को ईएल के ज्यादा रुपये दिए गए हैं, उनकी रिकवरी की जाए।
पेंशन फाइल की जांच करने पर पता चला है कि पीजीआई पेंशन नियमों को दरकिनार कर रही है। आठ कर्मचारियों को 32.71 लाख की पेशेंन ज्यादा दे दी गई है। इनमें पांच डाक्टर है, जिनमें से दो की मौत भी हो चुकी है। आडिटर ने कहा कि ज्यादा दी गई पेंशन कर्मचारियों से वसूली जाए।
सुभाष चंदर, चेयरमैन, एंटी करप्शन फ्रंट पीजीआई ने बताया कि जब स्वास्थ्य मंत्रालय से आडिट टीम आई थी तो उस दौरान मैंने कई मुद्दे उन्हें सौंपे थे, जो भ्रष्टाचार से संबंधित थे। इनमें मुख्य रूप से आला अधिकारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने, नियुक्तियों में धांधली और अन्य मुद्दे शामिल थे। लेकिन आडिट रिपोर्ट में उसका जिक्र नहीं किया गया है। ऐसा लगता है कि सब कुछ मैनेज हो गया है। इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को एक्शन लेना चाहिए।