सैन्य पदक से सम्मानित गांव बख्तगढ़ के सिपाही धर्मवीर सिंह ने मात्र 19 वर्ष की उम्र में पाकिस्तानी आतंकवादियों का मुकाबला करते वक्त शहादत का जाम पिया था। उनके परिवार ने सरकारों से मिला पैसा यादगार के निर्माण पर लगा दिया। अपने वादों से मुकरी सरकारों ने परिवार के किसी भी सदस्य को आज तक नौकरी तक नहीं दी है। गांव बख्तगढ़ के धर्मवीर सिंह 1997 के दौरान भारतीय सेना की 16 सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए थे।
धर्मवीर चार मई 2001 को पाकिस्तानी आतंकवादियों से मुकाबला करते पुंछ राजौरी सेक्टर में शहीद हो गए थे। सरकार ने गांव बख्तगढ़ के सरकारी स्कूल के नाम के साथ शहीद धर्मवीर का नाम जोड़ दिया और एक सड़क का नाम भी शहीद के नाम पर रख दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने शहीद के भतीजे को सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया लेकिन वह भरोसा आज तक पूरा नहीं हो सका।
शहीद धर्मवीर सिंह के पिता धनी राम सहगल पहले ही स्वर्गवासी हो गए थे। शहीद परिवार को सेना, केंद्र और राज्य सरकारों से करीब 14 लाख रुपये की राशि मिली थी, जिसे परिवार अपने बेटे की यादगार बनाने और पुण्यतिथियां मनाने में खर्च कर चुका है। शहीद के दो भाई विवेक व राजिंदर कुमार ट्रक ड्राइवरी कर रहे हैं।
शहीद की माता शिमला देवी का कहना है कि जब भी वह प्रशासन के पास जाती है तो सरकारी मुलाजिम कहते हैं अगर कोई सहूलियत लेनी है तो छोटा बच्चा पेश करो जो शहीद पर निर्भर था, अब छोटा बच्चा कहां से लाएं। शहीद धर्मवीर के परिजनों का कहना है कि नेता शहीदों को देश और कौम का सरमाया बता वोट बैंक जुटा रहे हैं। उन्हें चाहिए कि शहीद परिवारों से किए गए वादों को पूरा करें।