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चंडीगढ़ में बुजुर्गों का हाल: न मदद न कोई बात करने वाला, कई को अंतिम संस्कार की चिंता, रुला देगी इनकी कहानी

Fri, 30 Dec 2022 04:25 PM IST
ajay kumar प्रियंका ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़

सार

बढ़ती उम्र बुजुर्गों को डरा रही है। आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद उनके मन में अंतिम समय को लेकर चिंता है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हेल्पलाइन नंबर पर अब तक करीब छह हजार कॉल आ चुकी हैं। इनमें अधिकतर कॉल 60 से 70 साल आयु वर्ग के नागरिकों की थी। इसमें अपने निजी कार्यों से लेकर मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न संबंधित मदद मांगी गई है।
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सेक्टर 15 के वृद्धाश्रम में डाइनिंग हाल में खाना खाते बुजुर्ग। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अकेला हूं... मुझसे बात कर लीजिए। कोई इमरजेंसी होने पर मदद के लिए आ जाएंगे क्या? क्या आप मेरी मृत्यु के बाद मेरा अंतिम संस्कार कर सकते हैं? सिटी ब्यूटीफुल में अकेले रह रहे कई बुजुर्ग कुछ इसी तरह की मदद मांग रहे हैं। किसी का चश्मा नहीं बन पा रहा है तो किसी की पेंशन रुक गई है। परिवार होने के बावजूद कई बुजुर्ग अपने ही घर में खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। वे मदद के लिए ही नहीं, अकेलेपन से निजात के लिए भी हेल्पलाइन नंबर पर फोन कर रहे हैं। इन बुजुर्गों को सहारे की नहीं, साथ की जरूरत है। घरों के अलावा शहर के चार वृद्धाश्रमों में वर्तमान में 102 बुजुर्ग रह रहे हैं।

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 चार फरवरी 2022 को वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 14567 शुरू किया गया था। इस पर रोज आने वाली कॉल चंडीगढ़ में रह रहे बुजुर्गों की कहानी बयां कर रही हैं। हेल्पलाइन नंबर पर औसतन रोज 20 कॉल आ रही हैं। इनमें ज्यादातर कॉल में बुजुर्गों को इमरजेंसी पर मदद और अंतिम समय की चिंता झलकती है। भरा पूरा परिवार होने के बावजूद बुजुर्ग अपने अंतिम संस्कार के लिए रुपये एकत्रित कर रहे हैं। जब बुजुर्ग अपनी व्यथा हेल्पलाइन पर बताते हैं तो कर्मचारी भी उन्हें भरोसा देने  के साथ मदद पहुंचाने का प्रयास करते हैं। हेल्पलाइन के माध्यम से वृद्ध नागरिकों को जानकारी, सहायता, कानूनी मार्गदर्शन व भावनात्मक सहारे की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं। किसी भी बुजुर्ग के लावारिस मिलने पर हेल्पलाइन उनका बचाव करती है और उन्हें उनके परिवार से मिलाने में भी मदद करती है।

बढ़ती उम्र डरा रही, 10 माह में 6 हजार कॉल
बढ़ती उम्र बुजुर्गों को डरा रही है। आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद उनके मन में अंतिम समय को लेकर चिंता है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हेल्पलाइन नंबर पर अब तक करीब छह हजार कॉल आ चुकी हैं। इनमें अधिकतर कॉल 60 से 70 साल आयु वर्ग के नागरिकों की थी। इसमें अपने निजी कार्यों से लेकर मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न संबंधित मदद मांगी गई है।

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बात करने को कोई नहीं मिला तो मिलाया हेल्पलाइन नंबर
सेक्टर-22 निवासी एक बुजुर्ग ने फोन कर वृद्धावस्था से जुड़ी सारी योजनाओं, पेंशन के बारे में पूछा और अंत में बताया कि उनकी कोई समस्या नहीं है, उन्होंने तो बस यूं ही मन किया तो फोन कर लिया था। कर्मचारियों ने बताया कि रोजमर्रा की बातें करने के लिए भी बुजुर्गों के पास कोई नहीं है। प्रतिदिन ऐसे कई फोन आते हैं।

बेटा बहुत दिनों से नहीं बनवा रहा चश्मा
सेक्टर-15 निवासी एक वृद्ध की ओर से हेल्पलाइन नंबर पर फरियाद की गई कि उनका बेटा बहुत दिनों से उनका चश्मा नहीं बनवा रहा है। क्या आप मेरा चश्मा बनवा सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि घर के सदस्य बुजुर्गों को समय नहीं देते, इस कारण उन्हें हेल्पलाइन नंबर पर ही बात करनी पड़ती है।

फोन कर छह माह बाद घर पहुंची राजवंती
मानसिक तनाव से गुजर रहीं 67 वर्षीय राजवंती को घर का रास्ता भूलने की वजह से छह माह तक सड़कों पर ठोकरें खानी पड़ीं। 12 जनवरी से परिवार की ओर से तलाश शुरू की गई लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। राजवंती ने किसी से पूछकर वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन पर फोन किया जिसके बाद विभाग की मदद से वह परिवार से मिल पाईं। 
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तसबीर कौर, उम्र 75 वर्ष
सेक्टर-15 स्थित वृद्ध आश्रम में रह रहीं तसबीर कौर की आंखें नम हो आईं, जब उनसे उनके परिवार के बारे में पूछा गया। तसबीर ने बताया ‘यहां हम सभी प्रेम से रहते हैं, किसी चीज की कमी नहीं पर बच्चों की याद आती है तो दिल भर आता है।’ एक साल से वृद्धाश्रम में रह रही तसबीर कौर के दोनों बच्चे जब उनकी देखभाल करने से मुकर गए तो उनके देवर-देवरानी उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आए।
 
वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन की सबसे अच्छी बात यह है कि जो भी बुजुर्ग फोन करते हैं, उनका एक डाटा तैयार किया जा रहा है। जो समस्या वह बताते हैं, उसे संबंधित विभाग को भेजने के बाद 24 घंटे के अंदर बुजुर्ग को जानकारी भी दी जाती है। हर कॉल रिकॉर्ड की जाती है ताकि अधिकारी उसे चेक कर सकें। ये बुजुर्गों के लिए एक वन प्वाइंट सेंटर के तौर पर बखूबी काम कर रहा है। -नीतिका पवार, सचिव, समाज कल्याण विभाग

 
सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की जरूरत 
पहले पूरा गांव एक परिवार के रूप में रहता था लेकिन शहरीकरण में लोगों का सामुदायिक जीवन समाप्त होता जा रहा है। बाजारीकरण और व्यक्तिवाद के चलते संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है। आने वाले समय में यह समस्या और अधिक बढ़ने वाली है। इससे बचाव के लिए आवश्यक है कि प्रशासन बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा को बढ़ाए और लोग अपनों की अहमियत को समझें। - डॉ. मंजीत, समाजशास्त्री।
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