नारी शक्ति: गरीबी और अनपढ़ता भी नहीं झुका पाई मनदीप कौर का हौसला, मेहनत कर बेटियों को पहुंचाया अच्छे मुकाम तक
Tue, 08 Mar 2022 03:08 AM IST
भूपेंद्र सिंह
वेद प्रकाश, संवाद न्यूज एजेंसी, नयागांव/न्यू चंडीगढ़
सार
मनदीप कौर ने परिवार के हालात को बदलकर दोनों बेटियों को एक नामी निजी संस्थान से शिक्षा हासिल करवाई। वहीं, आज उनकी बेटियां युवाओं को भी पढ़ने में मदद कर रही हैं।
ब्लॉक माजरी स्थित गांव की रहने वाली मनदीप कौर 3000 रुपये प्रति महीने की नौकरी करती हैं। उनका परिवार शुरू से ही गरीबी और अनपढ़ता की मार झेल रहा था। लेकिन, 23 साल पहले शादी के समय बच्चों को पढ़ाने का जो ख्वाब देखा था वह मनदीप कौर ने अपनी मेहनत और लगन से हासिल किया।
विज्ञापन
42 साल की मनदीप कौर की शादी 23 साल पहले ब्लॉक माजरी स्थित गांव बूथगढ़ में हुई थी। लेकिन, परिवार में कोई भी शिक्षित नहीं था और आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। तभी उन्होंने ठाना कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाकर हालात बदल देंगी। इस मंजिल के रास्ते में गरीबी और अनपढ़ता के कारण बहुत परेशानियां सामने आईं।
लेकिन, परिश्रम और बुलंद हौसले से सभी परेशानियों को चुनौती दी। मनदीप कौर ने बताया कि तीन बच्चों में बड़ी बेटी दिलप्रीत कौर को उन्होंने खरड़ के रायत बाहरा यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करवाई है। उनके पास कॉलेज फीस के पैसे नहीं होते थे। लेकिन, बेटी ने 12वीं में करीब 90 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। इससे उन्हें छात्रवृत्ति के पैसे मिल जाते थे। छोटी बेटी तरनप्रीत कौर इसी कॉलेज से बीएड कर रही है।
विज्ञापन
लोगों के घरों में काम करके जुटाए पैसे
मनदीप कौर ने बताया कि उसके पति सुखबीर सिंह मजदूरी करते हैं। इससे घर का खर्चा चलाती थी। जबकि बच्चों की पढ़ाई के लिए मैं लोगों के घरों में काम करती थी। यहां से जो पैसे मिलते थे, उनको मैंने जमा किया। लोगों के घरों में काम के अलावा मैं मनरेगा में भी काम करती थी। कुछ समय पहले उन्हें 3000 रुपये की नौकरी मिली है। अपनी कमाई बच्चों की पढ़ाई के लिए जमा की। मुझे खुशी है कि आज मेरे बच्चे पढ़ लिख गए हैं।
मुसीबतें भी नहीं रोक पाई हौसलों को
मनदीप कौर ने बताया कि कच्चा घर होने के कारण बारिश में छत से पानी टपकता था। ऐसे में सामान के साथ बच्चों की किताबें भी भीग गई थीं। बिजली भी नहीं आती थी, तो बच्चों को दीपक जलाकर पढ़ाती थी। दोनों लड़कियां पढ़ने के लिए खरड़ जाती थी तो बस के पास और अन्य किराए के पैसे मुश्किल से जुट पाते थे।