पीजीआई की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक दो साल के भीतर सिर्फ दो पुरुषों की नसबंदी की गई है। साल 2012 और 2013 में एक-एक पुरुष नसबंदी के लिए संस्थान में आए थे। आधा साल 2014 बीत गया है, लेकिन स्थिति जस के तस है। इसके विपरीत महिलाओं की स्थिति में लगातार इजाफा हो रहा है।
दो साल के भीतर 949 महिलाओं की नसबंदी की जा चुकी है। साल 2013 में 477 महिलाओं की नसबंदी की गई, जबकि 2014 में 470 की। इससे पहले भी आंकड़ा 450 से पार था। विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी पुरुषों को लगता है कि नसबंदी से उन्हें कमजोरी आ जाएगी।
यह सबसे ज्यादा मिथ्य फैला हुआ है। महिलाओं के बजाए पुरुषों में आपरेशन की प्रक्रिया काफी आसान है। यह सुविधा जिले स्तर के सभी हास्पिटल में सुविधा उपलब्ध है।
पीजीआई की तरह सेक्टर 16 जीएमएसएच के हालात भी अच्छे नहीं है। यहां भी 250 महिलाओं के मुकाबले 1-2 पुरुष का आपरेशन किया जा रहा है। कालोनियों में स्थित हेल्थ सेंटर में काम करने हेल्थ वर्कर बताते हैं कि यहां के पुरुषों में जागरूकता की काफी कमी है।
फैमिली प्लानिंग के बात पर वे महिलाओं को ही आगे करते हैं। महिलाओं पर दबाव डालकर उन्हें ही हेल्थ सेंटर ले आते हैं। जब इस बारे में पुरुषों से बात की जाती है तो वे दूर भागने लगते हैं। इस बारे में काफी तेजी से जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
गायनी डिपार्टमेंट को किया जा रहा है ट्रेंड
पीजीआई स्थित फैमिली
वेलफेयर यूनिट एंड चीफ मेडिकल आफिसर डा. नीलम चौधरी ने बताया कि नसबंदी का
काम अब तक सिर्फ यूरोलाजी डिपार्टमेंट में चल रहा था।
अब इस बारे में गायनी
विभाग के डाक्टरों को भी ट्रेनिंग दी जा रही है। इससे फैमिली प्लानिंग के
अभियान को बल मिलेगा। जागरूकता अभियान में तेजी लाई जा रही है। इस साल
अच्छे परिणाम आएंगे।