इस बार पंजाब में लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब की सियासी फिजा बदली नजर आएगी। 2014 में सबको चौंकाने वाली आम आदमी पार्टी की चमक भी अब फीकी पड़ चुकी है। 'आप' के अलावा शिरोमणि अकाली दल में फूट पड़ने के बाद नई पार्टियां अस्तित्व में आई हैं। इन्हें गठित करने वाले क्षत्रपों का सियासी भविष्य भी दांव पर लगा है। वहीं, एक बार फिर मुख्य मुकाबला परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों कांग्रेस व शिअद-भाजपा के बीच सिमटने के आसार दिख रहे हैं।
'आप' ने 2014 में पंजाब में शिअद के बराबर सर्वाधिक चार सीटें जीत कर सबको हैरान कर दिया था। पार्टी को 25 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। संगरूर में भगवंत मान ने सुखदेव ढींढसा को रिकार्ड वोटों से हराया था। मालवा में पार्टी की जबरदस्त लहर थी। लेकिन पांच सालों में वह कमजोर होती गई। 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंचने की उम्मीद लगाए बैठी 'आप' को सिर्फ बीस सीटें मिलीं।
हालांकि वह प्रमुख विपक्षी दल का खिताब हासिल करने में कामयाब रही। उसके बाद के घटनाक्रम से 'आप' और कमजोर हुई। पूर्व नेता प्रतिपक्ष सुखपाल खैरा ने बगावत कर पंजाबी एकता पार्टी बना ली। 'आप' के छह विधायक भी उनके साथ हैं। ऐसे में 'आप' कितनी बड़ी चुनौती बन पाएगी, इसे लेकर काफी संशय है।
पुराने दिग्गजों ने शिअद-टकसाली बना ली
शिअद के पुराने दिग्गजों रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, डॉ. रतन सिंह अजनाला और सेवा सिंह सेखवां ने अलग शिअद-टकसाली बना ली। जिसका 'आप' के साथ गठबंधन लगभग फाइनल है। उधर, खैरा भी लोक इंसाफ पार्टी, बसपा पंजाब और डॉ. धरमवीर गांधी के साथ गठबंधन कर चुके हैं। ये दो नए गठबंधन शिअद और 'आप' को कितना नुकसान पहुंचाएंगे, इस पर सभी की नजरें हैं।
वहीं, सुखपाल खैरा, ब्रह्मपुरा, अजनाला और सेखवां जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी भविष्य भी इन चुनाव में दांव पर लगा है। डॉ. धरमवीर गांधी और बीर दविंदर सिंह भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। अगर इनकी पार्टियां चुनाव में कुछ खास नहीं कर सकीं तो अब तक साथ आए लोग भी छोड़कर जा सकते हैं। उधर, सत्ताधारी कांग्रेस के लिए ये फायदेमंद समीकरण बन रहे हैं।
क्योंकि नई पार्टियां अपनी पुरानी पार्टियों को ही नुकसान पहुंचाती दिख रही हैं। ऐसे में इस बार फिर मुकाबला कांग्रेस और शिअद-भाजपा के बीच सिमटता नजर आ रहा है।