हरियाणा में अस्तित्व में आने के बाद इनेलो अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। अब तक लड़े पांच लोकसभा चुनाव में इस बार पार्टी को सबसे कम वोट मिले। इंडियन नेशनल लोकदल ने चुनाव चिन्ह चश्मे पर पहली बार 1999 में चुनाव लड़ा था। यह चुनाव इनेलो ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा। दोनों दलों ने पांच-पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और सभी दस सीटें जीती थी। हालांकि, इसके बाद इनेलो और भाजपा की राहें जुदा-जुदा हो गई और 2004 में दोनों दलों ने अलग-अलग ताल चुनावी दंगल में ठोकी।
भाजपा तो सोनीपत लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हो गई, लेकिन इनेलो का खाता नहीं खुल पाया। इससे सबक लेते हुए 2009 में दोनों दल फिर साथ आए और लोकसभा चुनाव पांच-पांच सीटों पर मिलकर लड़ा। मगर, जनता ने भाजपा-इनेलो गठबंधन को नकारते हुए नौ सीटें कांग्रेस और एक सीट हिसार हजकां बीएल की झोली में डाल दीं। 2014 में मोदी लहर में भाजपा-इनेलो फिर अलग-अलग चुनाव लड़े। भाजपा का समझौता हजकां बीएल के साथ था। भाजपा ने अपने हिस्से की आठ सीटों में से सात जीत ली।
इनेलो ने इस चुनाव में हिसार व सिरसा सीट जीतकर अपनी लाज बचाई। 2019 का लोकसभा चुनाव इनेलो के लिए सबसे मुश्किल रहा। 2018 में पार्टी ही नहीं चौटाला परिवार भी टूटा। इनेलो से टूटकर दुष्यंत चौटाला ने अपनी पार्टी जजपा बना ली। न तो इनेलो न ही जजपा इस चुनाव में कोई सीट जीत पाई। इनेलो को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। उसके वोट प्रतिशत में बीते बीस साल में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।