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लोकसभा चुनाव 2019: स्थानीय मुद्दे हावी रहे तो पवन बंसल का पलड़ा रहेगा भारी, पर आसान नहीं राह

Wed, 03 Apr 2019 02:38 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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pawan bansal
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पूर्व सांसद पवन बंसल की असली जंग अब शुरू होने वाली है। स्थानीय मुद्दे हावी रहे तो उनका पलड़ा भारी रहेगा, पर राह बिल्कुल आसान भी नहीं होगी। वे अपनी उम्मीदवारी के लिए पूरी तरह से निश्चित थे, इसलिए उन्होंने कभी भी ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिसमें हताशा व हड़बड़ी के भाव दिखाई पड़े हों। चुनाव की तैयारी तो वे पिछले ढाई साल से कर रहे थे। हर आंदोलन, विरोध, प्रदर्शन और धरने में वे पार्टी का चेहरा रहे हैं।
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हालांकि चुनाव में उनका मुकाबला कैसा रहने वाला है, यह बहुत कुछ भाजपा के उम्मीदवार और चुनावी मुद्दे पर निर्भर रहने वाला है। भाजपा से कोई भी आए, बंसल की राह आसान नहीं होने वाली। ऐसा इसलिए, क्योंकि भाजपा के उम्मीदवार के पास मोदी नाम का एक एक्स फैक्टर है, जो चुनाव को अपनी ओर मोड़ सकता है। लेकिन सब कुछ पिछले साल जैसा रहेगा, ऐसा इस बार नहीं होने वाला। साल 2014 के चुनाव में तो मोदी लहर थी।

इसलिए पवन कुमार बंसल भाजपा की मौजूदा सांसद किरण खेर से करीब 70 हजार वोट से हारे थे। यह कोई खास मार्जिन नहीं है, क्योंकि उस समय कांग्रेस के खिलाफ काफी एंटी इनकंबेसी थी और भाजपा के पक्ष में लहर। इस बार के चुनाव में पिछली दफा जैसी स्थिति नहीं है। न तो भाजपा के खिलाफ एंटी इनकंबेसी है और न ही भाजपा के पक्ष में लहर। ऐसी स्थिति में सारा खेल चुनावी कैंपेन और मुद्दों पर निर्भर रहने वाला है।
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राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा गया चुनाव, तो भाजपा का पलड़ा भारी

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा गया तो भाजपा का पलड़ा भारी रहने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा का राष्ट्रीय मुद्दा एयर स्ट्राइक, आतंकवाद और भ्रष्टाचार होगा। यदि ये मुद्दे हावी रहे तो बंसल की राह मुश्किल हो सकती है। यदि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया तो बंसल फायदे में रह सकते हैं। सिटी ब्यूटीफुल की दुर्गति होना, हर मोर्चे पर निगम का फेल होना, सफाई में 20वें नंबर पर आना, फंड की कमी होना जैसे मुद्दे भाजपा को परेशानी में डाल सकते हैं। अब यह सब कांग्रेस के चुनावी मैनेजर पर ही निर्भर करेगा कि वे स्थानीय मुद्दों को कैसे कैच करते हैं।

पिछली बार आप ने बिगाड़ा था खेल
पिछले चुनाव में पवन कुमार बंसल को एक लाख 21 हजार 720 वोट मिले थे, जबकि आप की प्रत्याशी गुल पनाग को एक लाख आठ हजार छह सौ उन्यासी वोट। बंसल के गुट से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि आप के खाते में इतने वोट नहीं जाते तो बंसल की स्थिति शायद कुछ और होती। लेकिन भाजपा से जुड़े लोग इसे दूसरे नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि यदि आप मुकाबले में नहीं होती तो भाजपा की जीत का मार्जिन और अधिक होता। हालांकि इस बार भी आप के प्रत्याशी पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन मैदान में हैं। जो पिछली बार किरण खेर के पक्ष में प्रचार कर रहे थे। धवन का भी अपना वोट बैंक है। वे भी भाजपा और कांग्रेस में सेंध लगाने के लिए तैयार है।

छह फेज के चुनाव पर बहुत कुछ निर्भर रहेगा
ऐसा माना जाता रहा है कि चंडीगढ़ में लोग उसी को जिताते हैं, जिसकी केंद्र में सरकार बनने वाली होती है। एक-दो चुनाव को छोड़कर यही ट्रेंड रहा है। चंडीगढ़ में सबसे आखिरी फेज में चुनाव होने हैं। छह फेज के चुनाव में काफी हद तक यह पता चल जाएगा कि माहौल किस ओर है। ऐसे में यहां के लोग भी माहौल के साथ जाना चाहेंगे। इस स्थिति में इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है।
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