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लोकसभा चुनाव 2019: खडूर साहिब 1977 में कांग्रेस के हाथों से फिसल पंथक गढ़ बना, ऐसे थे समीकरण

Tue, 19 Mar 2019 01:55 PM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
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सुखबीर बादल(फाइल फोटो)
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खडूर साहिब संसदीय क्षेत्र (जो पहले तरनतारन लोकसभा क्षेत्र था) ने कई दिग्गज नेताओं को लोकसभा में भेजा है। तरनतारन लोकसभा हलका कभी कांग्रेस का गढ़ था। 1952 से लेकर 1971 तक यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार जीतते रहे। इन बीस साल में कांग्रेस की टिकट पर जीतने वालों को पंडित जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में शामिल होने का सम्मान भी मिला।
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तरनतारन से जीतने वालों में पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया के दादा सुरजीत सिंह मजीठिया भी शामिल हैं, जो पंडित नेहरू की कैबिनेट में मंत्री थे। सुरजीत सिंह मजीठिया ने इस संसदीय हलके से 1952 और 1957 में चुनाव लड़ा और दोनों बार अकाली दल को मात दी। गुरदियाल सिंह ढिल्लों ने इस हलके से 1962 से 1971 तक तीन बार चुनाव लड़ा। तीनों बार जीते और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कैबिनेट में रहे। फिर लोक सभा के स्पीकर पद पर पहुंचे।

1977 में इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ते हुए इस संसदीय हलके से जीत हासिल की। अकाली दल के उम्मीदवार तत्कालीन प्रधान जत्थेदार मोहन सिंह तुड़ ने कांग्रेस के उम्मीदवार व लोक सभा के स्पीकर गुरदियाल सिंह ढिल्लों को पराजित किया था। जत्थेदार तुड़ की जीत ने इस संसदीय हलके को पंथक गढ़ में बदलने की नींव रखी। इसके बाद 2014 तक के लोकसभा चुनाव में अकाली दल ही यहां से विजेता रहा। आतंकवाद के काले दौर में तरनतारन को लघु खालिस्तान कहा जाता था।
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इस तरह चला जीत हार का सिलसिला

1984 के लोकसभा चुनाव में टकसाली अकाली नेता तरलोचन सिंह तुड़ चुनाव जीते। 1989 में सिमरनजीत सिंह मान ने शिअद (अमृतसर) की टिकट पर चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड तोड़ मतों से जीत हासिल की। हालांकि उसके बाद मान ने जितनी बार भी यहां से चुनाव लड़ा, उनकी जमानत जब्त हुई। 1991 में अकाली दल ने जब लोकसभा चुनाव का बहिष्कार किया, तब कांग्रेस की टिकट पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के बेटे सुरिंदर सिंह कैरों ने चुनाव जीता था।

1996 में जब वाजपेयी सरकार 13 दिन तक चली थी, तब यहां से शिअद की टिकट पर मेजर सिंह उबोके ने चुनाव जीता। इसी साल दोबारा हुए चुनाव में बादल ने उबोके का टिकट काट कर तरलोचन सिंह तुड़ को टिकट दिया, जिन्होंने चुनाव जीता। 1998 में हुए चुनाव में अकाली दल ने एसजीपीसी के पूर्व अध्यक्ष व टकसाली नेता प्रेम सिंह लालपुरा को टिकट दिया। लालपुरा ने कांग्रेस की उमीदवार गुरिंदर कैरों को पराजित किया।

1999 के लोक सभा चुनाव में शिअद की टिकट पर तरलोचन सिंह तुड़ ने कांग्रेस के उमीदवार दिलबाग सिंह डलिके को पराजित किया। 2004 लोकसभा चुनाव में तुड़ परिवार को नजरअंदाज कर शिअद देहाती के प्रधान और पूर्व मंत्री डॉ. रतन सिंह अजनाला को टिकट दिया गया। पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे डॉ. अजनाला ने जीत हासिल की।

2004 के बाद इस संसदीय हलके को खडूर साहिब का नाम देकर इसके साथ जुड़े नौ विधानसभा हलकों में भी बदलाव कर दिया गया। इस पंथक गढ़ के साथ जुड़े अटारी और राजासांसी विधानसभा हलके को अमृतसर संसदीय हलके के साथ जोड़ दिया गया।   
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दो सांसदों ने लिखा नया इतिहास

इस संसदीय हलके से जीत प्राप्त करने वाले दो नेताओं ने राजनीति की नई इबारत लिखी। 1998 में प्रेम सिंह लालपुरा ने इसलिए संसद में प्रवेश नहीं किया कि उनकी वरिष्ठता को नजर अंदाज करके फिरोजपुर से जीते सुखबीर बादल को मंत्री बनाया गया। प्रेम सिंह द्वारा नियमों के अनुसार शपथ न ग्रहण करने के कारण उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी।

इसके बाद लालपुरा ने इस पंथक गढ़ में अपना राजनीतिक वजूद तलाशने की काफी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सके। सिमरनजीत सिंह मान ने 1989 लोकसभा चुनाव जीतने के बाद बड़ी तलवार के साथ संसद भवन में दाखिला न मिलने पर शपथ नहीं ली। बाद में उन्होंने छोटी श्री साहिब के साथ शपथ उठाई थी।
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