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हरियाणा में मुद्दों पर भारी ‘मोदी’, संकट में सियासी विरोधी, पीएम की इमेज ने कुछ ऐसे बदली हवा

Fri, 24 May 2019 01:46 PM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
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हरियाणा में लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया है। इस चुनावी जंग में जहां सूबे के मुद्दों पर ‘मोदी’ भारी रहे, वहीं इस जीत से भाजपा के विरोधी भी संकट में हैं। पार्टी की इस ऐतिहासिक जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हरियाणा में अभी ‘मोदी मैजिक’ का असर बरकरार है। जिसके बूते न केवल विरोधी दलों की तमाम रणनीतियां धरी रह गईं, बल्कि यही जादू भाजपा प्रत्याशियों के लिए विरोधियों के खिलाफ मजबूत ढाल भी बना।
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अब प्रदेश भाजपा के लिए यह चुनौती होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव तक  भी इस मोदी मैजिक को बरकरार रखा जाए, ताकि लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में भी विधायकों का बेड़ा पार हो सके। लोकसभा चुनाव से पहले सूबे में सभी सियासी दलों ने पूरी रणनीति के साथ मैदान में उतरने की कसरत की थी। भाजपा, कांग्रेस, इनेलो, जजपा, आप, बसपा, लोसुपा समेत अन्य दलों ने बाकायदा उन मुद्दों को तैयार किया, जिस पर इन दलों ने अपने विरोधियों की घेराबंदी करनी थी।

शुरूआती दौर में हरियाणा में भाजपा ने सीएम मनोहर लाल सरकार के पिछले साढ़े चार साल के विकास कार्यों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के पांच साल के कामों को आधार बनाते हुए चुनावी जंग की शुरुआत की। विजय संकल्प रैलियों में सीएम समेत सभी मंत्रियों और अन्य भाजपा  नेताओं ने इन्हीं मुद्दों पर विरोधियों को घेरना शुरू किया।
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बिखराव में बंटी कांग्रेस के हर सीट पर थे अलग मुद्दे

दूसरी ओर, सूबे में बिखराव में बंटी कांग्रेस के सभी प्रत्याशी हर सीट पर अपने अलग मुद्दे और वादे लेकर आगे बढ़ रहे थे। कुछ कांग्रेसी प्रत्याशी जहां मनोहर और मोदी को निशाने पर लिए हुए थे, तो कुछ प्रत्याशी राहुल के ‘अब होगा न्याय’ एजेंडे को लेकर चल रहे थे, जिसमें गरीबों को हर साल 72 हजार रुपये देने के कांग्रेस के वादे पर जोर दिया जा रहा था। उधर, चुनावी मुकाबले में इनेलो के प्रत्याशी बेमन से लड़ते दिखाई दिए। फिर भी इनेलो ने प्रदेश के कुछ स्थानीय मुद्दों और जाट आरक्षण आंदोलन व डेरामुखी मामले में हुई हिंसा के मृतकों को शहीद का दर्जा  देने जैसे वादों को उछाले रखा।

इनेलो से अलग होकर पहली बार चुनाव लड़ रही जननायक जनता पार्टी (जजपा) ‘ताऊ’ यानी पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की विचारधारा के सहारे चुनावी रण में थी। मुद्दा था प्रदेश में रोजगार, महिला सुरक्षा, पेंशन बढ़ोतरी और सूबे का विकास। इसके साथ-साथ जजपा नेताओं ने पीएम मोदी और सीएम मनोहर की कथित विफलताओं को भी हथियार बनाने की कोशिश की। उधर, इस चुनाव में जजपा की सहयोगी रही आम आदमी पार्टी के ‘दिल्ली मॉडल’ के सहारे ही मैदान-ए-जंग में थी।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की उपलब्धियों को आधार बनाकर आप के नेता प्रदेश में ‘भाजपा का खूंटा पाड़ने’ का ही राग अलपाते रहे। इसके अलावा भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर चुनाव तो लड़ा, मगर जातिगत सोशल इंजीनियरिंग के अलावा इस गठबंधन के पास कोई खास मुद्दा ही नहीं था। इस गठबंधन का मुख्य फोकस अनुसूचित जाति और पिछड़ों की राजनीति करने तक ही सीमित रहा।
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मोदी के इमोशनल दांव की काट न कर पाए विरोधी

हरियाणा में जब चुनाव आखिरी दौर में पहुंचा तो आखिरी सप्ताह में मोदी फैक्टर ने विरोधी दलों के सभी मुद्दों को फीका कर दिया। हालांकि भाजपा ने मोदी के कामों का शोर तो बराबर चुनाव में मचाए रखा, लेकिन आखिरी हफ्ते में मोदी की तीन फतेहाबाद, कुरुक्षेत्र और रोहतक रैलियों ने सूबे में सियासी हवा का रुख बदलकर रख दिया।

उसके बाद तो हरियाणा के तमाम मुद्दों पर मोदी ही भारी हो गए। मोदी ने अपनी रैलियों में सभी प्रत्याशियों को अपने साथ तो खड़ा किया, लेकिन मंच से किसी भी प्रत्याशी का नाम न लेते हुए मतदाताओं से सिर्फ कमल का बटन दबाकर सीधे ‘मोदी’ को ही वोट करने की अपील की।

इतना ही नहीं पीएम ने बहुत ही खास अंदाज में खुद को हरियाणा की माटी से जोड़ा और हरियाणा की माटी के लिए मरने से भी पीछे न हटने तक की बात मंच से कह डाली। मोदी ने हरियाणा के मतदाताओं से यह तक कहा कि हरियाणा उनका घर है, उनकी कर्मभूमि है, वे जानते हैं कि हरियाणा की जनता उन्हें मायूस नहीं करेगी और सभी सीटें जीतकर उन्हे विजयश्री का आशीर्वाद देगी।

 
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